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जनसंख्या नियन्त्रण बनाम समाज एवं राष्ट्र की सुरक्षा? उचित या अनुचित, निर्णय स्वयं करें !

23 जून, 1996 के ” पाञ्चजन्य” के अंक में पूज्य संत रामसुखदासजी महाराज द्वारा श्री अशोक सिंगल को लिखे गये पत्र के मुख्य अंश प्रकाशित हुए, जिसमें उन्होंने लिखा था कि धर्मान्तरण के घाटे की पूर्ति तो सम्भव है किन्तु परिवार नियोजन के कारण होने वाले घाटे की पूर्ति असम्भव है। इसके साथ ही सम्पादकीय टिप्पणी भी थी कि ” यद्यपि परिवार नियोजन के पक्ष में अकाट्य तर्क है… बड़े परिवार गरीबी और बेरोजगारी ही बढ़ाते हैं”। लेखक के विचार में उक्त सम्पादकीय टिप्पणी वाली बातें सम्पूर्णतः मान्य नहीं है। यहां विषय से सम्बन्धित कतिपय गम्भीर पहलू छोड़ दिये है।

नीतिवचन है कि- “विनाश काले विपरीत बुद्धिः “। जिन-जिन तथाकथित विकसित देशों ने परिवार नियोजन व गर्भपात जैसे हथकण्डे जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर अपनाये, वहां धीरे-धीरे पतन हुआ है और दुष्परिणाम सामने आने पर उनके द्वारा और प्रलोभन-आर्थिक सहायता देकर संतति संख्या बढ़ाने को प्रेरित किया गया है। वस्तुस्थिति यह है कि आज परिवार कल्याण व समरूप क्रियाओं के परिणामस्वरुप ही एकमात्र संतान के अवज्ञाकारी हो जाने पर नित नये वृद्धाश्रम और बुजुर्गजनों को जीवन के उत्तरार्ध में अपमानित होकर बेघर होना पड़ रहा है। जनसंख्या वृद्धि व गरीबी जैसी बातें मिथ्या धारणाओं पर आधारित है। समझने की जरूरत है कि जन्म पर तो नियंत्रण और मौत पर कोई नियंत्रण नहीं, यह कैसी बुद्धिमानी है ?

एक अहम् सवाल है कि जब स्त्री-पुरुष एक समान व हिन्दु-मुस्लिम भाई-भाई जैसे अनेकों नारे नित्य प्रति प्रचलन में आ रहे हैं तो इस राष्ट्र में जन्म लेने वाले, पलने वाले प्रत्येक नागरिक पर समान कानून और समान क्रिया लागू क्यों नहीं है ?

जब हम राष्ट्रभाषा हिन्दी की बात करते हैं तो जबरन थोपने का आरोप लगाया जाता है; जब हम हिन्दू की बात करते हैं तो हमें साम्प्रदायिक करार दिया जाता है; जब हम समान कानून की बात करते हैं तो एक वर्ग विशेष की भावनाओं को आहत पहुंचाने की बात कहकर चुप कराया जाता है। (समान नागरिक संहिता के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का भी खुला उल्लघन हो रहा है। )

कहीं यह सब सुनियोजित षड्यंत्र तो नहीं है ?

जनसंख्या नियंत्रण का ढिंढोरा पीटकर राष्ट्र को गुमराह करने वाले तथाकथित नेतागण इस राष्ट्र को बतायें कि उनके स्वयं के कितनी कितनी सन्तानें हैं? बात-बात पर फतवे जारी करने वाले बतायें कि उनके अपने समाज में प्रति व्यक्ति कितने बच्चों का औसत है? यदि इन सब बातों का खुलासा कर सच्चाई से देशवासियों को अवगत करवाया जाये तो तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा हिन्दू समाज की आँखों पर जो पर्दा डाला जा रहा है वह समय रहते उठ सकता है।

इसी क्रम में तथ्यात्मक प्रतिवेदन बिन्दुवार है-

  1. परिवार कल्याण के नाम पर जब एक ही लड़का होगा या एक लड़का व एक लड़की होगी तब हमारे राष्ट्र की रक्षा के लिए तैनात मिल्ट्री व पैरामिल्ट्री यानि कि “फौज ” में कोई भी व्यक्ति अपनी एकमात्र संतान को क्यों और कैसे भेजेगा ? यानि कि आने वाले समय में वर्तमान सैनिक तो समय-समय पर सेवानिवृत होते जायेंगे परन्तु नई भर्ती के नाम पर जब संख्या नगण्य रहेगी तो सेना शब्द केवल सुनने मात्र को रह जायेगा, तब फौज के अभाव में राष्ट्र की सीमाएं कैसे सुरक्षित रहेगी ?
  2. लेखक के मन में अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति किंचित मात्र भी कोई दुराग्रह या अन्यथा सोच नहीं है, परन्तु परिवार कल्याण की योजना
    से हिन्दुओं की संख्या अब निरन्तर घट रही है, अनुपात 81 से घटकर 72 प्रतिशत रह गया है। ऐसे में आगे चलकर इस विसंगति से राष्ट्र के हिन्दुओं की कैसी दुर्दशा होगी? कश्मीर, केरल एवं बंगाल इसके उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि ये सब कुछ अनजाने में हो रहा है, गैर- राष्ट्रीय सोच के कुछ राजनैतिक दलों द्वारा अपना वोट बैंक बढ़ाने के चक्कर में योजनाबद्ध यह सब हो रहा है। वोटों की राजनीति आज राष्ट्र की धुरी बन चुकी है, कुत्सित प्रयासों से आज जो कुछ हो रहा है उसके दूरगामी दुष्परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतने होंगे एवं तब आज के नुकसान की पूर्ति असम्भव होगी। क्या शासन का कर्त्तव्य नहीं है कि समस्त नागरिकों से बिना लगाव या दुराव के समान आचरण करें एवम् राष्ट्र के भविष्य की रक्षार्थ नीति बनावें ।

3.

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः, यत्तेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः-

मनुस्मृति का यह श्लोक भी आज अपना आदर्श अर्थ खोता जा रहा है, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर भ्रूण हत्या यानि कि गर्भपात को बढ़ावा दिया जा रहा है। गर्भपात से निरपराध जीव की निर्मम हत्या के साथ माता को भी तात्कालिक व दीर्घकालीन बिमारियां लग जाती है। आने वाले जीवन को आने से पूर्व ही रोकना या उसकी जन्म लेने से पूर्व ही नृशंसतापूर्वक हत्या करना ( गर्भपात) स्वतः ही एक अधर्म व सभ्य समाज के लिए कलंक की बात है। केवल प्राणी ही नहीं समस्त पदार्थ भी प्रकृति के अधीन है, ऐसे में प्रकृति के विधान में हस्तक्षेप एवं कुचेष्टा निश्चय ही विनाशकारी है। परिवार कल्याण व गर्भपात जैसे कृत्य के कारण मातृशक्ति केवल भोग्या बन कर रह जाती है.. ..यह कितनी बेसमझी की बात है।

  1. आज के भौतिक युग में हमारे देश में इस प्रकार की अव्यवस्था, व्यवस्था के नाम पर स्थापित हो चुकी है कि जब परिवार की संतति संख्या एक या अधिकतम दो तक ही सीमित रहेगी तब एक कमाऊ सदस्य यानि धन अर्जित करने वाले सदस्य के अतिरिक्त कोई दूसरा सदस्य न होने की स्थिति में आज भी घरेलू व सामाजिक व्यवस्थाएं गड़बड़ाई हुई हैं। जब घर का कार्य ही पूरा नहीं होगा तब समाज व राष्ट्र का कार्य कौन करेगा ?
  2. जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर गर्भपात को बढ़ावा से पुरुष-स्त्री के अनुपात में समीकरण आज भी गड़बड़ा रहे है। आज भी राष्ट्रीय आंकड़े 1000 पुरुषों के पीछे 914 स्त्रियां दर्शाते हैं। लोग इस बात को समझने की चेष्टा नहीं कर रहे हैं कि आज भी स्थापित व्यवस्थाएं चरमरा रही है और आने वाले समय में पर्याप्त संख्या में विवाह योग्य लड़कों के लिए पर्याप्त संख्या में लड़कियां नहीं मिलने पर उत्पन्न विसंगति से समाज व राष्ट्र का कितना अनर्थ होगा ?
  3. जब प्रायः सभी परिवारों में एक या दो तक ही संतति संख्या सीमित रहेगी तब खेती करने वाला सदस्य कहां से आयेगा ? हमने बचपन से पढ़ा व सुना है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और इस देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है जो कि कृषि पर ही निर्भर है। पूर्व में जब हिन्दुस्तान की जनसंख्या कम थी तब अनाज बाहरी देशों से आयात करना पड़ता था परन्तु जैसे-जैसे हमारे देश की जनसंख्या बढ़ती गई, हम कृषि के मामले में आत्मनिर्भर होते गये हैं यानि कि जनसंख्या बढ़ोत्तरी से भूखमरी बढ़ने जैसी बातें मिथ्याकारी है। चाहे कितनी ही नई-नई तकनीक से कृषि की जायें परन्तु आज भी पौध रूपाई, फसल कटाई के समय मानव शक्ति की कमी प्रकट में दिखाई पड़ती है।

अतः लेखक इस धारणा से सहमत है कि धर्मांतरण के घाटे की पूर्ति तो जैसे-तैसे हो सकती है परन्तु परिवार कल्याण व गर्भपात के घाटे की पूर्ति असम्भव है। जो जीव आना चाहता है या माता की कोख में आ चुका है उसे रोकने का किसी को भी कोई अधिकार नहीं है। खासतौर पर गर्भपात तो महापाप है। भारतीय संस्कृति अहिंसा व करूणा के मूल्यों को विकसित करने की धरा है, परन्तु यह कैसी विडम्बना है कि जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर उत्पन्न समस्याओं को आधुनिकता का लबादा ओढ़ाकर आवश्यकता के रूप में स्थापित करने के कुत्सित प्रयास हो रहे हैं। परिवार कल्याण व गर्भपात से तथाकथित जीवन को सुखी बनाने की होड़ मे मानवता कितनी आहत हुई है, सर्वविदित है। जनसंख्या नियंत्रण कानून बने इसके हम विरोधी नहीं है, परन्तु आज जनसंख्या बढ़ने का होवा खड़ा कर करोड़ों हिन्दुओं को जन्म लेने से रोका गया है, यह सरासर अन्याय है, गलत है। इस ज्वलंत समस्या को समझने की, चिंतन करने की सामयिक जरूरत भी

है ।

वन्दे मातरम्!

लेखक - रामकिशोर तिवारी
(राष्ट्रीय अध्यक्ष)
9414183939

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