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विकारों से मुक्ति और समता, समर्पण से भक्ति- यतिश्री अमृत सुन्दरजी


बीकानेर, 04 अगस्त। रांगड़ी चौक के बड़ा उपासरा में शुक्रवार को यतिश्री अमृत सुन्दरजी ने भक्तामर स्तोत्र की ग्यारहवीं व बारहवीं गाथा का वाचन-विवेचन करते हुए कहा कि मन, वचन व कर्म में शुद्धि, विकारों से मुक्ति और समता, समर्पण, शांति के भाव से परमात्म भक्ति प्राप्त होती है। मन के विकारों और दृष्टि दोष को दूर करते हुए परमात्मा के अस्तित्व का स्मरण करते हुए की गई भक्ति फलदायक होती है।
उन्होंने कहा कि आत्मा के परमात्मा से जुड़ने के बाद संसार व सांसारिक विषय वस्तुओं से मोह नहीं रहता। सच्चा भक्त, सत्य साधक को केवल परमात्मा के सद्गुण ही दिखाई देते है। सच्चे भाव व मन से भक्ति करने वाला परमात्म स्वरूप् बन जाता है । परमात्मा के प्रति दास भाव रखने वाले का मलीनमन स्वच्छ हो जाता है, दृष्टि दोष समाप्त हो जाते है वह आत्मिक, आध्यात्मिक उन्नति की सुख-समृद्धि को प्राप्त करता है। परमात्मा के आत्म दर्शन के बाद संसार से मोह नहीं रहता। परमात्मा का सच्चा भक्त दूसरों के सद्गुण देखता है, अवगुण नहीं । सद्गुण देखने वाला गुणी व अवगुण देखने वाला दुष्ट बन जाता है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा का वीतरागी रूप जगत में सबसे सुन्दर है, उसे पहचानने के बाद भक्ति की दृष्टि अन्य कहीं स्थिर नहीं होती । रोम-रोम में परमात्मा की वीतरागता के बसने के बाद भक्त भी सिद्धपद के मार्ग को प्राप्त कर सकता है। परमात्मा का शांत वीतराग स्वरूप् देखने के बाद भक्ति की दृष्टि अन्यत्र कहीं नहीं टिकती। अतीन्द्रिय चैतन्यरस का स्वाद चखने वाले भक्त इंद्रिय विषयों में रमण नहीं करता।
यति सुमति सुन्दर ने 18 पाप स्थानक का ’’राग’’ पाप का वर्णन करते हुए कहा कि
राग यानि भविष्य की आग। चाहने की इच्छा व आसक्ति, लगाव राग है। राग हटाने पर वैराग्य आ जाता है। व्यक्ति में राग परिस्थिति, चाह के हिसाब से होता है। परस्थिति अनुकूल रहने पर में राग अच्छी, प्रतिकूल परिस्थिति राग बुरी लगती है । सत्य साधना से आसक्ति व राग-द्वेष पर नियंत्रण अभ्यास करवाया जाता है।
यतनि समकित प्रभा ने कहा कि प्रभु, ध्यान, साधना व भक्ति का मार्ग राग-द्वेष व विकार और दुखों को जड़ से समाप्त कर देता है। भगवान महावीर ने चेतना को दर्पण की उपमा दी गई। दर्पण निर्लिप्त होता, राग द्वेष नहीं करता। दर्पण का काम वास्तविक स्वरूप् दिखाना है। हमें आत्म दर्पण में देखते हुए परमात्म की साधना, आराधना व भक्ति करनी चाहिए।

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