वैरागी-संत अपने तर्पण श्राद्ध जीते जी कर लेते हैं,
मां नीं भूल सकूं थांरो प्यार, रियोडो़ दुलार … श्रद्धा से श्राद्ध मनाओ तो जानूं, बड़ा ही गहरा ज़हर भरा, मन आत्मा पर… बड़े सलीके से लबों को खोलना,… राष्ट्रीय कवि चौपाल 588 वीं कड़ी “श्राद्ध में श्रृद्धा… किस संदर्भ में उचित…? किस परिप्रेक्ष्य में अनुचित… ?” विषय को समर्पित रही आज के कार्यक्रम अध्यक्षता … Read more