
आलेखः
आचार्य श्री महाश्रमणजी के 51 वें दीक्षा कल्याणक महोत्सव और 15 वें पट्टोत्सव पर दिनांक 22 मई व 18 मई 2024 के उपलक्ष्य में सादर समर्पित।
!! ऋजुता का प्रतिक महाश्रमण !!
सरदारशहर में श्री झुमरमल जी दुगड़ कुल में मातुश्री नेमा देवी की कुक्षि से युगपुरुष योगीराज बालक मोहन का जन्म हुआ। रेगिस्तानी चमचमाती मखमली बालू की गलियों में बाल पुष्प का लालन पालन हुआ। आचार्य श्री तुलसी की अनुज्ञा से जौहरी मुनिश्री सुमेरमल जी ने दो संत मुनिश्री मुदित और मुनिश्री उदित को सरदारशहर में संयम रत्न प्रदान किया। विनम्रता के धनी, प्रज्ञा के जिज्ञासु और ऋजुता को समर्पित! गुरु दृष्टि की अल्पकालीन साधना में ही अपने आराध्य देव के ह्रदय में वास कर मुनि मुदित से मुनिश्री महाश्रमणजी के रूप में आध्यात्मिक जगत में विश्व विख्यात हुए। तेरापंथ धर्मसंघ की विकासोन्मुखी अंतरंग विचार संगोष्ठी में धीर-गंभीर व भावी शासन नायक महाश्रमणजी को पाकर चतुर्विध धर्मसंघ प्रफुल्लित हुआ। जन-जन के भाग्य विधाता का संपोषण युग के दो दो महान् दार्शनिकों और क्रांतिकारी आध्यात्मिक महापुरुष आचार्य श्री तुलसी व आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के द्वारा हुआ।आप आगम शास्त्र जैसे महान ग्रंथों के ज्ञातपुरुष बनें। भिक्षु तपोवन का अहोभाग्य है कि बाल ब्रह्मचारी, पुरुषार्थी, महातपस्वी के इग्गाहरवें आचार्य का निर्माण व चयन दो महान् विभुतियों के दिशा निर्देशन में हुआ। स्वयं के जीवन निर्माता, मानवता के मसीहा, राष्ट्र संत श्री तुलसी के महाप्रयाण के असाधारण पल की असाध्य पीड़ा को सहानुभूति से सहन किया और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के "हनुमान" बनकर विश्व धरा से पहुंचे लाखों गमगीन श्रृद्धालुओं को संबल प्रदान किया। ऐतिहासिक तपो: स्थली गंगाणे में परम श्रद्धेय आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के सान्निध्य में हजारों हज़ारों श्रद्धालु जन युवाचार्य महाश्रमण पदारोहण के साक्ष्य बनकर धन्यता से अभिभूत हुए। 21 वीं सदी के महान दार्शनिक परम श्रद्धेय आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का सरदारशहर में देवलोक हुआ। तत्पश्चात तेरापंथ धर्मसंघ की यशस्वी आचार्य परम्परा का उत्तरदायित्व आपश्री के कंधों पर आया।
संत शिरोमणि ऋजूमना आचार्य प्रवर ने रत्नाधिक, रुग्ण व वृद्ध साधु साध्वियों की सेवा सुश्रुषा पर विशेष अनुकंपा बरसाई और वयोवृद्ध श्रावक-श्राविकाओं के घर घर पधारकर आपने उन्हें अप्रत्याशित दर्शन लाभ देकर कृतार्थ किया।
अष्टगुणाधारी तीर्थंकर के प्रतिनिधि परम श्रद्धेय मरुभूमि से जन-जन में अहिंसा की ज्योत जलाते हुए दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहर लालकिले से धवल सेना की अहिंसा यात्रा को लेकर विदेशों की ओर प्रस्थान किया और नेपाल भूटान आदि अनारीय क्षेत्रों की पहाड़ी चोटियों पर “बिना रुके बिना थके” पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण लगभग 60 हजार से अधिक किलोमीटर की लम्बी पदयात्राओं के द्वारा आप अनवरत मानवता के उत्थान में अहिंसा के बीजारोपण में प्रवाहिमान है।
संघ की सारणा वारणा व प्रभावना करते हुए आपने जांत,पांत, रंग,भेद, धर्म और संप्रदाय के भेदभाव मुक्त सात्त्विक उद्दबोद्धन में सत्य, अहिंसा, सौहार्द्र और सहिष्णुता का अनुसरण करने की प्ररेणा व व्यसनमुक्त जीवन जीने का पथ दर्शन दिया। लाखों करोड़ों जनता जनार्दन से उनकी बुराईयों को भिक्षा में ग्रहण कर उन्हें आदर्श जीवन जीने का पाथेय दिया और चरैवेति चरैवेति मंत्र को चरितार्थ किया।
नेपाली धरा पर भूकंप से थरथराती विनाशकारी आपदा में आपके परिपार्श्व में श्रृद्धालुओं ने आप श्री की संप्रेषित तरंगों से सुखानुभुति का अहसास किया और संकट की घड़ी से मुक्त होकर आह्लादित हुए।
ऋजुता के संवाहक अनुशासनप्रिय अनुशास्ता ने विश्व व्यापी कोरोना महामारी से त्राहिमाम के भयभीत वातावरण में “संयमित जीवनशैली” का मार्ग दर्शन दिया और मंत्र साधना का प्रायोगिक स्वरुप समाधान दिया।
अवसर्पणिकाल में जीवों की वीरादना के सजग प्रहरी करुणासागर ने ऋजुता को अंगीकार कर त्याग और तपस्या पर बल दिया।
बहुश्रुत के मूर्तरूप ने उत्तराध्ययन सूत्र व भगवत गीता के समावेश पर अद्भुत साहित्य संपदा प्रदान की।
अहिंसा के ज्योतिपुंज महातपस्वी ऋजुता की साधना में गतिशील प्रात:4 बजें से रात्रि 10 बजें तक व्याख्यान मालाओं के अनुक्रम के साथ साथ बौद्धिक, प्रबुद्ध, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, प्रोफेशनल, कवि, साहित्यकार, और पत्रकार आदि चिंतनशील वर्ग से चिंतन-मनन, वार्तालाप और सूत्रों की चर्चाओं के दौरान समीचीन उत्तर देते हुए स्थितप्रज्ञ प्रवर ने मानवीय मूल्यपरक शिक्षाओं की महत्ता को परिणीत किया।
अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी ने स्वस्थ समाज निर्माण व चरित्रवान राष्ट्र निर्माण में राष्ट्रीय स्तर पर विकास के नीतिगत निर्णयों पर भगवान महावीर की प्रासंगिकता और आध्यात्मिक और वैज्ञानिक मिश्रित विचारधाराओं में सम्यकज्ञान सम्यकदर्शन और सम्यकचारित्र का प्रतिबोध दिया।
अहिंसा के पुजारी, शांतिदूत, षष्टीपूर्ति युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी ने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भयाक्रांत विश्व को शांति के लिए भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित अनेकांतवाद और अपरिग्रह दर्शन का अकल्पनीय “प्रकाशपुंज” दिया।
सादर समर्पित!!
रचनाकार:: 7734968551
मोहनलाल भन्साली “कलाकार”
गंगाशहर, बीकानेर, राजस्थान
दिनांक 17.05.2024















