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जैन दर्शन के अनुसार जीव के कर्म के अनुसार बंधन-मुनि सम्यक रत्न सागर महाराज


बीकानेर, 23 अक्टूबर। जैनाचार्य पीयूष सागर सूरीश्वरजी के सानिध्य में मंगलवार को ढढ्ढा चौक के प्रवचन पंडाल में धर्म चर्चा में बीकानेर के मुनि सम्यक रत्न सागर महाराज ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार जीव जैसे कर्म करता है, उसको उसी के अनुसार कर्म बंधन अवश्य होते है। पूर्व जन्मों के किए गए कर्मों का फल हम इस भव में प्राप्त कर रहे है। कर्मों के अनुसार संसार में सुख-दुख मिलते है।
उन्होंने कहा कि दर्शनावरणीय कर्म के उदय होने से आत्मदृष्टि क्षय होती है। दर्शनावरणीय कर्म आत्मा के गुण अर्थात सामान्य बोध को आवृत करता है। दर्शनावरणीय के अनेक भेद है इनमें चक्षु दर्शनावरण, अचक्षु दर्शनावरण, अवधि दर्शनावरण व केवल दर्शनावरण प्रमुख है। चक्षु संबंधी मति ज्ञान से होने वाले सामान्य अवलोकन को चक्षु दर्शन, चक्षु के अलावा अन्य इंद्रियों और मन से संबंधी मति ज्ञान से पहले होने वाला सामान्य अवलोकन अचक्षु दर्शन, अवधि ज्ञान से पहले होना सामान्य अवलोकन अवधि ज्ञान, केवल ज्ञान के साथ होने वाले सामान्य अवलोकन केवल दर्शन कहलाता है।


मुनिश्री ने एक प्रसंग के माध्यम से कहा कि भारतीय संस्कृति, जैन दर्शन व आयुर्वेद में बासी आहार को खाने का निषेध किया है। कई वैज्ञानिकों की धारणा है कि बासी रोटी व अन्य आहार के खाने से अनेक बीमारियों पर नियंत्रित करने की धारणा बिलकुल मिथ्या है। बासी खाने में पैदा होने वाले दृश्य-अदृश्य जीव मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।


मुनि संवेग रत्न सागर ने सान्निध्य में मुनि तत्व रत्न सागर महाराज के ताऊ बाड़मेर के शंकर लाल छाजेड़ का श्री सुगनजी महाराज का उपासरा के मंत्री रतन लाल नाहटा व संतोकचंद मुसरफ ने अभिनंदन किया। वरिष्ठ श्रावक शंकर लाल छाजेड़ परिवार की ओर से श्रावक-श्राविकाओं को प्रभावना प्रदान की गई।

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Prakash Samsukha

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