
गर्भस्थ शिशु संरक्षण समिति भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामकिशोर तिवाड़ी के निर्देशानुसार संस्था के हिसार (हरियाणा) के अध्यक्ष दीपक डालमिया के प्रयासों से दिल्ली के एडवोकेट संचार आनन्द द्वारा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पीआईएल को स्वीकार कर चीफ़ जस्टिस शील नागू एवं जस्टिस संजीव बेरी की खण्डपीठ ने केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है, इसमें याचिकाकर्ता द्वारा मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी अधिनियम के एक प्रावधान को चुनौती दी गई है जिसमें डाक्टर को किसी महिला के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुक़सान होने की धारणा पर गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देता है , याचिका कर्ता का तर्क है कि मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की अनुपस्थिति में डाक्टर द्वारा महिला के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने का अनुमान लगाना ग़लत है उन्होंने कहा कि गर्भपात की अनुमति सिर्फ़ गर्भस्थ शिशु अथवा गर्भवती महिला के जीवन को ख़तरा हो तो दी जा सकती है दूसरी सभी परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना है । इस याचिका में गर्भपात अधिनियम 1971 की धारा 3(2) और उसके साथ जुड़ी व्याख्या को चुनौती दी गई है और इस मामले पर 16 सितम्बर के लिए सुनवाई तय की है। याचिकाकर्ता ने गर्भपात की मौजूदा व्यवस्था को चुनौती दी है, जहां पीड़ित महिला को यह साबित करना पड़ता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। अन्य दूसरी परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति चिकित्सकों के अनुभव पर आधारित होती है जो सही नहीं है । एमटीपी एक्ट के तहत, एक पंजीकृत चिकित्सक गर्भपात की अनुमति दे सकता है, यदि वह इस स्थिति के आधार पर यह निष्कर्ष निकालता है कि गर्भ ठहरना महिला के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि गर्भधारण और बलात्कार के मामलों में कानून पीड़ित के विपरीत कार्य करते हुए अवैध लिंग जांच के बाद यदि भ्रूण कन्या का होता है, तो गर्भपात करने को धारा 3 में अपराध माना जाता है।
केंद्र सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया, जहां चिकित्सक गर्भपात की अनुमति देते हैं, वहां यह व्यवस्था महिला के स्वास्थ्य और उसके जीवन की रक्षा के लिए है। ऐसे में किसी भी बदलाव से जुड़ा आदेश महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालेगा।
संस्था के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष ने जानकारी देते हुए बताया कि क़ानून में अनैक विसंगतियों है पिता की मृत्यु के बाद जन्म लेने वाले शिशु को पिता की सम्पत्ति में सभी अधिकार है तो जन्म से पूर्व अजन्मे जीवित प्राणी को मार देना साज़िश या अन्याय नहीं है क्या? निःस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे एडवोकेट संचार आनन्द एवं उनकी टीम का संस्था के साधकों ने आभार व्यक्त किया ।












