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मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण ऐसे कलेक्टरों को मेरा सलाम! —- मनोहर चावला वरिष्ठ पत्रकार की कलम से

✍️ मनोहर चावला

मेरा सौभाग्य रहा कि मैंने बीकानेर में जिला कलेक्टर श्री मुन्नालाल गोयल, एम के खन्ना, टी, श्रीनिवासन, आर एन मीणा और उस समय के सिटी मजिस्ट्रेट ललित, के . पवार और बाद में जयपुर में श्री के एल कोचर, सुनील अरोड़ा, विनोद जुस्ती और एम एल गुप्ता के सानिध्य में कार्य करने का अवसर मिला। ये लोग उच्च अधिकारी होते हुवे भी सहज, सरल और मानवीय सवेंदनाओ से परिपूर्ण थे। इन्हें आई ए एस होने का तनिक भी घमण्ड नहीं था। मुन्नालाल गोयल हर शाम पाँच बजते ही सिटी मज़िट्रेट, पी डब्लू डी, जलदाय विभाग, नगर परिषद, यूआईटी के अधिकारियों और एस पी पुलिस और मुझे भी फ़ोन करते कि अब काम ख़त्म कर लिया होगा मेरे पास आ जाओ मिल के चाय पियेगे। बस फिर क्या था कलेक्टर चेम्बर में सभी अधिकारी चाय- पकोड़ो को लुत्फ उठाते। अब गोयल साहब कहते, चलो बाज़ार तक थोड़ा टहल आये। सभी अधिकारी कलेक्ट्रेट से कभी कोटगेट, कभी स्टेशन रोड, कभी प्रकाश चित्र सिनेमा तक पैदल ही बाते करते चलते। चलते चलते पीडब्लूडी केअफसर को मुन्नालाल जी कहते क्या शर्मा जी, आपकी सड़के जगह जगह टूट रही है, नगर परिषद के सूद साहब को कहते – क्या सूद साहब आप के होते हुवे शहर में इतनी गंदगी, देखो कुत्ते और आवारा पशु आराम से सड़को पर घूम रहे है। बिजली वाले अधिकारी को कहते , अंधेरा हो रहा है स्ट्रीट लाइट नहीं जल रही हैं ट्रेफिक की अव्यवस्था पर एसपी साहब आप मालिक हो। मीठी मीठी भाषा में सभी संबंधित अधिकारियों को उनको अपनी ड्यूटी और काम बता देते। मज़े की बात यह कि अगले दो- तीन दिनों में सारे काम हो जाते। क्लेक्टर साहब कभी ऑर्डर नहीं देते अपितु उन्हें आईना दिखाते। कार्य पूरे होने पर वे उन्हें धन्यवाद भी देने में कभी चूक नहीं करते। इस प्रकार शहर स्वच्छ और सुंदर बना रहता था। एम के खन्ना साहब भी ऐसे ही क्लेक्टर थे। एक बारी हरिजनों की हड़ताल के कारण नगर गंदगी के ढेरों में तब्दील हो गया । तब एम के खन्ना ने सभी अधिकारियों के साथ, मैं भी इसमें सम्मिलित था, नगर में जगह जगह झाड़ू लगाकर सफाई की। कलेक्टर साहब ने तो कोटगेट के पास एक बंद गट्टर को खोल कर उसमे घुस कर उसकी सफाई की। वे कई राते गाँवो में बिताते और ग्रामवासियो की समस्याओं का निराकरण करते। वे जन जन के प्रिय कलेक्टर थे। कलेक्टर टी. श्रीनिवासन भी ग़ज़ब के सादगी पसंद सज्जन थे। मैंने एक बारी उनके नाम से अखबारों में न्यूज़ छपवा दी। वे बहुत खपा हुए और मुझे ताकीद की कि भविष्य में मेरा नाम अखबारों में नहीं आना चाहिए सिर्फ़ सरकार का, विभाग का, प्रशासन का नाम से न्यूज़ लगनी चाहिय। वे बहुत ही ईमानदार और सादगी पसंद एव दिल के धनी व्यक्ति थे। हमने रेलवे ग्राउंड में माता की चौकी गीतकार चंचल के सानिध्य में आयोजित करवाई थी । कलेक्टर साहब पत्नी सहित पूरी रात माता के जागरण में बैठे। जब घर जाने लगे तो उनके जूते कहीं नहीं मिले। वे नंगे पाँव ही घर गए। हमने उन्हें नए जूते लाकर दिए उन्होंने नहीं लिए। हमने रेलवे ग्राउंड में पंडाल का कोना कोना ढूंढा आख़िर एक जुतो की पुरानी जोड़ी हमे मिली। हम उन्हें लेकर झिझकते हुए उनके निवास गए वे अपने जुतो को देखकर बहुत खुश हुए। वे कभी भी निजी काम के लिए सरकारी गाड़ी का उपयोग नहीं करते थे । आर एन मीणा तो सुबह सुबह घोड़े पर बैठकर दलबल सहित शहर का भ्रमण करते, अतिक्रमण तुड़वाते, सफाई करवाते और दुकानदारों को निर्देश देते कि वो अपनी दुकान का कचरा सड़क पर न फेंके। अब बात करे, उस समय के सिटी मजिस्ट्रेट ललित. के . पंवार की, वह आई ए एस अफसर थे और परीक्षण काल के दौरान यहाँ आए थे इतने सीधे ओर सरल स्वभाव के थे कि कार्यालय समय के बाद वे पैदल ही चुपचाप शाम को मेरे सूचना केंद्र पर आ जाते और वहाँ पुस्तके पढ़ते। मुझे जब मालूम हुआ मैंने उन पर तवज्जो दी और उन्हें घर के लिए पढ़ने के लिए काफ़ी सामग्री और किताबे दी। उन्हें हमेशा मैं सूचना केन्द्र बंद होने के बाद स्कूटर पर सर्किट हाउस छोड़ आता। उनसे कुछ घनिष्ठा बढ़ी, मैं उन्हें अपने घर लाता, खाना साथ ही खाते। साथ साथ नगर भ्रमण भी करते। एक बारी हम दोनों ने मिलकर विश्व ज्योति सिनेमा में नक़ली टिकटों के कारोबार पर छापा मारा और सात सात दिनों तक सिनेमा हॉल को सीज़ किया। ऐसे ही कलेक्टर अजीत सिंह सिंघवी भी एक ज़िंदादिल इन्सान थे वे रात्रि को किराडू जी की पान की दुकान पर पान खाने आ जाते और वहाँ बैठे पत्रकारो, कवियों, हरीश भदानी , मो. सद्दीक, धनजय वर्मा, भवानी शंकर व्यास विनोद , अज़ीज़ आज़ाद और मौजूद राजनेताओं में महबूब अली, रामकिशन दास गुप्ता और अन्य लोगो के साथ गुप्तगू करते। फ़िलहाल अभी इतना ही— जयपुर के के. एल. कोचर, सुनील अरोड़ा, विनोद जुत्शी और सचिव श्री सी के मैथ्यू के बारे में फिर कभी लिखूँगा। बस इतना ही कहूँगा कि ये लोग इतने सरल और सहज थे। मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण थे। अब आप ही बताइये कि ऐसे लोग हमे मिलेगे, जो जनता के बीच आकर घुलमिल सके, उनके दुख- दर्द को समझ सके , उन्हें दूर कर सके।

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दिलीप गुप्ता

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