

आचार्य चौक की “अमर सिंह राठौड़ री रम्मत” :
बीकानेर की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर
राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति में यदि किसी नगर ने अपनी लोकपरंपराओं को आज भी उतनी ही जीवंतता के साथ सँजोकर रखा है, तो वह है बीकानेर। यहाँ की हवेलियाँ, किले, लोकसंगीत और उत्सव केवल इतिहास की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि वर्तमान में धड़कती सांस्कृतिक चेतना हैं। इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण लोक-नाट्य है — रम्मत। विशेष रूप से आचार्य चौक में मंचित होने वाली “अमर सिंह राठौड़ री रम्मत” बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान का सशक्त प्रतीक है। रम्मत बीकानेर की पारंपरिक लोक-नाट्य शैली है, जिसका आयोजन मुख्यतः होली के अवसर पर किया जाता है। खुले चौक में, साधारण मंच व्यवस्था के साथ, स्थानीय कलाकारों द्वारा पूरी रात चलने वाली यह प्रस्तुति जनसहभागिता और सामुदायिक एकता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है। ढोलक, नगाड़ों और ओजपूर्ण संवादों से सजी रम्मत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकइतिहास का जीवंत पाठ है। आचार्य चौक में होने वाली “अमर सिंह राठौड़ री रम्मत” का केंद्र 17वीं शताब्दी के वीर योद्धा अमर सिंह राठौड की गाथा है। वे मारवाड़ के राठौड़ वंश के स्वाभिमानी और पराक्रमी सरदार थे। मुगल सम्राट शाह जहांन के दरबार में मनसबदार रहते हुए भी उन्होंने अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं किया। दरबार के मीर बख्शी सलावत खां ने अमर सिंह को ‘गंवार’ कह दिया था। स्वाभिमानी अमर सिंह ने भरी सभा में अपनी कटार निकाली और सलावत खां का वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने अपने घोड़े के साथ आगरा के किले की दीवार से छलांग लगा दी । वे नागौर के शासक थे, लेकिन उनका मुख्य कार्यक्षेत्र और उनके जीवन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना मुगल दरबार (आगरा) में घटित हुई थी। इसीलिए बीकानेर की रम्मतों में उनके उसी ‘स्वाभिमान’ और ‘वीरता’ का गुणगान किया जाता है जो उन्होंने मुगल सत्ता के सामने दिखाया था। यह घटना उनकी अदम्य साहस और स्वाभिमान का प्रतीक बन गई और अंततः अमरसिंह को धोखे से उसी के साले के हाथों बादशाह ने मरवा दिया । आचार्य चौक की रम्मत में आज भी इस ऐतिहासिक प्रसंग को अत्यंत ओज और भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया जाता है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा धारण कर वीर रस से ओतप्रोत संवादों के माध्यम से दर्शकों को उस युग में ले जाते हैं। विशेष बात यह है कि इस लोक-नाट्य में महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष कलाकार निभाते हैं, जो इसकी पारंपरिक संरचना को दर्शाता है।
28 फरवरी को आचार्य चौक में आयोजित हुई यह “अमर सिंह राठौड़ री रम्मत” केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और त्याग की अनुपम विरासत है। आचार्य चौक में इस रम्मत की परंपरा अत्यंत गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी रही है। इस रम्मत में सर्वप्रथम श्रद्धेय स्वर्गीय मेघराय जी आचार्य उर्फ मेघसा उस्ताद ने अमर सिंह राठौड़ की भूमिका संभाली और इस परंपरा की मजबूत नींव रखी। आचार्य चौक आज भी इस गौरवशाली परंपरा का निर्वहन अत्यंत श्रद्धा, समर्पण और सामूहिक आस्था के साथ करता आ रहा है। मान्यता है कि यह रम्मत माँ राय भवानी के आशीर्वाद से तथा भैरूनाथ के अखाड़े से आरंभ होती है। अखाड़े से रम्मत का आगाज़ होना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि लोक-विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है।
मेघसा उस्ताद की इस रम्मत में महत्त्वपूर्ण भूमिका का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग आज भी समाज को भाव-विभोर कर देता है। एक ओर भैरूनाथ के अखाड़े में रम्मत का मंचन चल रहा था, तो दूसरी ओर उसी समय उनकी सगी पुत्री का निधन हो गया। जब यह दुःखद समाचार उन्हें प्राप्त हुआ, तब एक पिता के रूप में उनका हृदय अवश्य व्यथित हुआ होगा; किन्तु उन्होंने व्यक्तिगत शोक से ऊपर उठकर सामाजिक दायित्व और सांस्कृतिक मर्यादा को प्राथमिकता दी। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि यह माँ राय भवानी का अखाड़ा है, अतः रम्मत पूर्ण करने के पश्चात ही वे अपनी पुत्री के अंतिम संस्कार का कार्य करेंगे। एक पिता के लिए यह निर्णय अत्यंत कठिन, पीड़ादायक और साहस से भरा हुआ था। उनके इस त्याग, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा ने सम्पूर्ण समाज को यह संदेश दिया कि लोकसंस्कृति और सामाजिक दायित्व केवल परंपराएँ नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य हैं। यही कारण है कि मेघसा उस्ताद का नाम आज भी इस रम्मत के इतिहास में अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है। आज भी माँ राय भवानी और भैरूनाथ के इस पावन अखाड़े में स्तुति के समय प्रत्येक पात्र उनका नाम लेकर श्रद्धापूर्वक नमन करता है और उन्हें अपनी सांस्कृतिक परंपरा का प्रेरणा-स्तंभ मानकर मंचन का प्रारंभ करता है। यह परंपरा उनके प्रति कृतज्ञता, सम्मान और आध्यात्मिक आस्था की जीवंत अभिव्यक्ति है। उस दौर में स्वर्गीय नंदलाल आचार्य उर्फ नंदू बाबा ने अमरसिंह राठौड़ का पात्र अत्यंत प्रभावशाली रूप में निभाया। उस कालखंड में उनके साथ मेघसा उस्ताद के मुख्य निर्देशन में अमरचंद पुरोहित हाड़ी रानी के रूप में तथा स्वर्गीय जेठमल आचार्य उर्फ सेठ बाबा, गोविंदलाल आचार्य सहित अन्य कलाकारों ने भी अपने-अपने महत्वपूर्ण किरदारों का सशक्त एवं सराहनीय निर्वहन किया करते थे । उनके पश्चात हथिया महाराज ने अमर सिंह राठौड़ का पात्र अत्यंत प्रभावशाली ढंग से निभाया और इस परंपरा को आगे बढ़ाया। तत्पश्चात बुलाकी दास उर्फ बुला काका ने इस भूमिका को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया तथा अपनी सशक्त प्रस्तुति से दर्शकों के हृदय में अमिट छाप छोड़ी। वर्तमान में पिछले लगभग 30 वर्षों से दीनदयाल आचार्य निरंतर अमर सिंह राठौड़ का पात्र ओजपूर्ण, प्रभावशाली और गरिमामय शैली में निभाते आ रहे हैं। इस वर्ष माँ राय भवानी के स्वरुप मे उज्ज्वल आचार्य ने निभाया इसके साथ ही वीररस प्रधान इस रम्मत में हाडी रानी के किरदार में अनिल आचार्य,
बादशाह विप्लव व्यास, सलावत खान बद्रीदास जोशी,
राम सिंह सुरेश कुमार आचार्य, हलकारा मूलचंद आचार्य, फरास एडवोकेट नवनीत नारायण, किसना नाई विजय कुमार आचार्य,अर्जुन गौड किशन कुमार पुरोहित तथा लखनऊ के नवाब के मनोरंजक किरदार मे गुंजन आचार्य मंचन कर दर्शकों को मोहित किया। इस प्रकार यह भूमिकायें केवल एक अभिनय नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही आस्था, समर्पण और सांस्कृतिक गौरव की श्रृंखला है, जो आज भी आचार्य चौक को बीकानेर की लोक-सांस्कृतिक चेतना का जीवंत केंद्र बनाए हुए है।
बीकानेर की कला और संस्कृति बहुआयामी है। यहाँ का स्थापत्य वैभव, स्थानीय चित्रकला शैली, लोकसंगीत और त्योहार इस नगर की सांस्कृतिक समृद्धि को प्रमाणित करते हैं। परंतु रम्मत जैसी लोक-परंपराएँ इस सांस्कृतिक धरोहर को समाज के बीच जीवित रखती हैं।
आचार्य चौक में जब “अमर सिंह राठौड़ री रम्मत” का मंचन होता है, तब वह केवल एक नाट्य आयोजन नहीं रहता, बल्कि सामूहिक स्मृति, स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव का उत्सव बन जाता है। यह परंपरा हमें यह संदेश देती है कि इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जनजीवन की धड़कनों में भी सुरक्षित रहता है।
इस प्रकार, आचार्य चौक की यह रम्मत बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान का उज्ज्वल अध्याय है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास, साहस और लोकपरंपराओं से जोड़ने का कार्य निरंतर करती आ रही है।
यह जानकारी हमें प्रदान की
श्री एडवोकेट नरेश आचार्य




























