महिला दिवस पर विशेष लेख
भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव शक्ति, सृजन और करुणा का स्वरूप माना गया है। “नारी तू नारायणी” का भाव यह दर्शाता है कि स्त्री केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की आधारशिला भी है। किंतु वर्तमान समय में इस आदर्श की वास्तविक सार्थकता तभी सिद्ध हो सकती है जब महिलाओं को सम्मान के साथ-साथ पूर्ण सुरक्षा भी प्राप्त हो। आज भारत सहित विश्व के अनेक देशों में महिलाओं के प्रति हिंसा, उत्पीड़न और दुष्कर्म जैसी घटनाएँ चिंता का विषय बनी हुई हैं, जो समाज को आत्ममंथन करने के लिए मजबूर करती हैं।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन भी उतना ही आवश्यक है। National Crime Records Bureau के आंकड़े समय-समय पर यह दर्शाते रहे हैं कि महिलाओं के प्रति अपराध केवल व्यक्तिगत विकृति का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक सोच, असमानता और जागरूकता की कमी से भी जुड़ा हुआ है। यदि समाज वास्तव में नारी को नारायणी मानता है, तो उसे देवी के रूप में पूजने के साथ एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में सम्मान और सुरक्षा देना भी आवश्यक है।
महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता है। कठोर कानून और त्वरित न्याय व्यवस्था अपराधियों में भय उत्पन्न कर सकती है, परंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है बचपन से ही लड़कों और लड़कियों दोनों में समानता और सम्मान की भावना विकसित करना। परिवार, विद्यालय और समाज यदि मिलकर सकारात्मक वातावरण बनाएँ, तो महिलाओं के प्रति हिंसा की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है। सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा, बेहतर परिवहन व्यवस्था, तकनीकी सहायता, हेल्पलाइन सेवाएँ और पुलिस की सक्रियता भी महिलाओं में सुरक्षा का विश्वास पैदा करती हैं। साथ ही महिलाओं को आत्मरक्षा प्रशिक्षण और आत्मनिर्भरता की ओर प्रेरित करना उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से सशक्त बनाता है।
आज की नारी हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध कर रही है, परंतु भय और असुरक्षा का वातावरण उसकी प्रगति में बाधा बन सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि समाज महिलाओं की सुरक्षा को केवल महिलाओं का मुद्दा न समझकर सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करे। जब महिलाएँ निर्भय होकर घर से बाहर निकल सकेंगी, अपने सपनों को पूरा कर सकेंगी और सम्मान के साथ जीवन जी सकेंगी, तभी “नारी तू नारायणी” का आदर्श वास्तविक अर्थों में साकार होगा।
निष्कर्षतः नारी का सम्मान केवल शब्दों या परंपराओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवहार, व्यवस्था और सोच में दिखाई देना चाहिए। जब समाज महिलाओं को सुरक्षा, समान अवसर और गरिमा प्रदान करेगा, तभी सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होगा।
**डॉ.अल्पना रामावतार बंशीवाल बीकानेर*
*सहायक आचार्य*
*राजनीति विज्ञान*
*9461366635*




























