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कल्पसूत्र के बताएं मार्ग पर चलने से कल्याण- जैनाचार्य श्रीपूज्य जिनचन्द्र सूरिश्वर..

बीकानेर, 15 अगस्त। जैनाचार्य श्रीपूज्य जिनचन्द्र सूरिश्वर के सान्निध्य में रांगड़ी चौक के बड़े उपासरे में पर्युषण पर्व के तीसरे दिन मंगलवार को जैन धर्म के प्रमुख धर्मगं्रथ कल्पसूत्र का वाचन विवेचन शुरू हुआ। सत्य साधना के चौथे दिन बड़ी संख्या में साधकों ने मौन रहकर साधना की। पाक्षिक प्रतिक्रमण के दिन बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सामयिक, सत्य साधना करते हुए अपने जाने-अन्जाने में हुए पापों की आलोचना की।
जैनाचार्य श्रीपूज्य जिनचन्द्र सूरिश्वर ने प्रवचन में कहा कि कल्पसूत्र की जैन आगमों के गणना नहीं की जाती लेकिन इसे जैनधर्म के वेद के रूप में सम्मान दिया गया है। यह सर्व शास्त्रों में शिरोमणि है । कल्पसूत्र में भगवान महावीर, पार्श्वनाथ सहित अनेक दिव्य विभूतियों, का जीवन चरित्र वर्णित है। भद्र बाहू द्वारा भगवान इसमें साधु, श्रावक व सुधर्म समाचारी का वर्णन है। शुद्ध भावना से कल्पसूत्र को तत्लीन होकर सुनने, कल्पसूत्र में बताएं मार्ग पर चलने से कल्याण संभव है।
यति अमृत सुन्दरजी ने कहा कि कल्प अर्थात आचार। इस पवित्र ग्रंथ में तीर्थंकर जीवन दर्शन, गणधर परम्परा एवं साधु समाचारी तीन अधिकार प्रस्तुत किए गए है। प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ यानि ऋषभदेव से लेकर 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर के विभिन्न कल्याणों, जीवन आदर्शों का वर्णन है। कल्पसूत्र महामंगलकारी है। इसके श्रवण से अनेक विध्नों व पापों का नाश होता है। नमस्कार महामंत्र के वाचन से व्याख्यान प्रारंभ होकर सर्वप्रथम तीर्थंकर महावीर प्रभु के जीवन दर्शन का वर्णन है। उन्होंने कहा कि नमस्कार सूत्र में अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, आत्म ज्ञानियों, साधुओं को नमन किया गया है।
यति सुमति सुन्दर ने कल्पसूत्र का वाचन-विवेचन करते हुए कहा कि साधु-साध्वियों को गोचरी लेने, साधु साध्वियों के महाव्रत, प्रतिक्रमण, गोचरी, चातुर्मास आदि के नियमों की जानकारी दी। यतिनि समकित प्रभा ने कहा कि सभी देवी-देवताओं को सम्मान, आदर दें तथा साधना आराधना व भक्ति आलौकिक परमात्मा की करें। अपनी आत्मा की तरह दूसरे की आत्मा की तरह समझते हुए प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव रखें।

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