
गंगाशहर
28.01.2024
मुनि चैतन्य कुमार ‘अमन’
आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान, “नैतिकता का शक्तिपीठ” में अपने विशेष प्रवचन कार्यशाला में मासिक पुण्यतिथि पर “आचार्य तुलसी का अनुशासन” विषय को प्रतिपादित करते हुए धर्मसभा में मुनि श्री चैतन्य कुमार ‘अमन’ ने कहा- व्यक्ति निर्माण, चरित्र निर्माण और जीवन निर्माण अनुशासन से ही सम्भव है। अनुशासन के अभाव में संस्कार और संस्कृति भी सुरक्षित नहीं रह सकती। कहा जा सकता है कि विकास का आधार है- अनुशासन! जब व्यक्ति का स्वयं पर नियंत्रण नहीं होता है तब होता है परानुशासन अर्थात् गुरु का अनुशासन! इसीलिए आचार्य तुलसी ने घोष दिया था “निज पर शासन-फिर अनुशासन”।

मुनि अमन ने आगे कहा- व्यक्तित्व विकास का एक अतिमहत्त्वपूर्ण पहलू है- अनुशासन! अनुशासन वह नींव का पत्त्थर है जिस पर जीवन का बहुमंजिला महल खड़ा किया जा सकता है। जीवन को सद्संस्कारों में ढ़ालने के लिए कड़ी मेहनत की अपेक्षा रहती है जबकि असद् संस्कार तो स्वतः ही आ जाते है उसके लिए किसी भी प्रकार की पाठशाला या प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती अतः अपेक्षा है व्यक्ति अनुशासन को सहना, अनुशासन में रहना सीखें। जो व्यक्ति अनुशासन में रहना व सहना सीख जाता है निश्चय ही वह बहुमूल्य हीरा बन कर चमक बिखेरने में कामयाब हो सकता है।

मुनि श्रेयांस कुमार जी ने आचार्य तुलसी के जीवन के कठोर अनुशासन को परिभाषित करते हुए मधुर गीत का संगान किया।

मुख्य वक्ता वरिष्ठ उपासक, युवक रत्न श्री राजेन्द्र सेठिया ने आजके विषय पर बोलते हुए कहा- विकास का आधारभूत तत्त्व है- अनुशासन! आज तेरापंथ का अनुशासन जग जाहिर है। जहां समूह है वहां अनुशासन की अपेक्षा रहती है, एकाकी व्यक्ति के लिए नहीं। जहां व्यक्ति अनुशासन को सह सकता है वही कुछ कह सकता है, रह सकता है। आचार्य तुलसी एक ऐसे अनुशास्ता थे जिन्होंने अपने अनुशासन से पूरे धर्मसंघ को आकाश सी ऊंचाईयां प्रदान की।

इस अवसर पर संस्थान की ओर से आभार प्रदर्शित करते हुए- मंत्री श्री दीपक आंचलिया ने अपनी बात प्रस्तुत की तथा उपाध्यक्ष श्री किशन बैद, कोषाध्यक्ष श्री ललित गुलगुलिया, सहमंत्री श्री राजेन्द्र पारख एवं श्री भैरूदान सेठिया आदि की सादर उपस्थिति रही।
✍ प्रकाश सामसुखा














