पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी भी कुमाता नहीं हो सकती :बजरंगदास महाराज
नोखा। श्री बालाजी सेवा धाम में गुरु पूर्णिमा महोउत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित सप्त दिविसिय श्रीमंद भागवत कथा के चौथे दिन रविवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। मीडिया प्रभारी पुखराज शर्मा ने बताया की नागौर, नोखा, बीकानेर,हरियाणा, पंजाब सहित राजस्थान के आस पास के गांवों से श्रोतोओ ने कथा श्रवण किया। कथा वाचक महाराज ने मीराबाई के चरित्र का व राजा परीक्षित और शुकदेव का प्रसंग सुनाया। शुकदेव परीक्षित संवाद का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार परीक्षित महाराज वन में चले गए। उनको प्यास लगी तो समीक ऋषि से पानी मांगा। ऋषि समाधि में थे, इसलिए पानी नहीं पिला सके। परीक्षित ने सोचा कि साधु ने अपमान किया है। उन्होंने मरा हुआ सांप उठाया और समीक ऋषि के गले में डाल दिया। यह सूचना पास में खेल रहे बच्चों ने समीक ऋषि के पुत्र को दी। ऋषि के पुत्र ने शाप दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प आएगा और राजा को जलाकर भस्म कर देगा। समीक ऋषि को जब यह पता चला तो उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखा कि यह तो महान धर्मात्मा राजा परीक्षित हैं और यह अपराध इन्होंने कलियुग के वशीभूत होकर किया है। समीक ऋषि ने जब यह सूचना जाकर परीक्षित महाराज को दी तो वह अपना राज्य अपने पुत्र जन्मेजय को सौंपकर गंगा नदी के तट पर पहुंचे। वहां बड़े ऋषि, मुनि देवता आ पहुंचे और अंत में व्यास नंदन शुकदेव वहां पहुंचे। शुकदेव को देखकर सभी ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। कथा सुनकर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए। कथा के दौरान भजनो पर श्रद्धालु जम कर झूमें। महाराज श्री ने कहा की भागवत कथा में ईर्ष्या को मनुष्य के पतन का कारण बताया गया है। ईर्ष्या एक ऐसी भावना है जो मनुष्य को नकारात्मकता की ओर ले जाती है और उसके पतन का कारण बनती है. ईर्ष्या मनुष्य को अपने ही कर्मों से नष्ट कर देती है। जब मनुष्य ईर्ष्या में जलता है, तो वह अपने सद्गुणों को खो देता है और विनाश की ओर अग्रसर होता है. ईर्ष्या से बचने के लिए भक्ति, सत्संग और अच्छे कर्मों का मार्ग बताया गया है। भगवान के नाम का जाप करने और दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा रखने से ईर्ष्या को कम किया जा सकता है महाराज ने कहा की माता पिता की महिमा का बताये हुए कहा की माता-पिता को नहीं भूलना चाहिए। माता-पिता का कर्ज कभी नहीं चुकाया जा सकता, और एक बेटा कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माँ कभी कुमाता नहीं हो सकती। माता-पिता को भगवान के समान माना जाता है, और उनका ऋण चुकाना असंभव है। वे हमें जीवन देते हैं, हमारा पालन-पोषण करते हैं, और हमें सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। माँ के पास इतना बड़ा आशीवार्द होता हे जो की ब्रह्माजी के पास नही है विष्णु जी के पास नही है। श्रीमद्भागवत कथा भगवान से जोड़ने की पाठशाला है भगवान को याद करो हमेशा चाहे कैसे भी करो हर समय भगवान का नाम अवश्य लो कही भी लो परमात्मा का स्मरण अवश्य करो। जीवन मे सबसे बड़ी विपत्ति भगवान को भूल जाना है और सबसे बड़ी सम्पति अपने इष्ट ओर भगवान को याद रखना है। जीवन में दान का महत्व बताया। उन्होंने कहा हमें अपनी संपत्ति और आय का कुछ भाग दान अवश्य करना चाहिए। यह प्रत्येक मानव का कर्तव्य है। दान वहां करो जहां वास्तव में दान की जरूरत हो पर दान ऐसा करो की एक हाथ से दूसरे हाथ तक पता नहीं चले। गुरु पूर्णिमा पर विशेष आयोजन होगा। मोहनलाल सोनी शंकर लाल सोनी करण सोनी ने महाराज श्री का साफा पहनाकर स्वागत किया। इस अवसर पर उपकोषाधिकारी रमेश व्यास,राजस्थान पेंशनर समाज अध्यक्ष इंद्रचंद मोदी,हरिकिशन शर्मा,राजेश अग्रवाल,मनोज उपाध्याय,हरिगोपाल उपाध्याय,जी एल तिवाड़ी,रविंद्र जाजड़ा,लक्ष्मीनारायण उपाध्याय,शक्तिराम जोशी, सहित अन्य जन प्रतिनिधियो ने कथा में बड़ी संख्या में कथा का रसपान किया व महाराज श्री से आशीर्वाद लिया।

















