
कांग्रेस प्रत्याशी को मिले 50 वोट, भाजपा के डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत ने हासिल किए 30 मत; 20 वोटों के अंतर से दर्ज की जीत
30 साल की सियासी मेहनत रंग लाई, अनिल कल्ला बने बीकानेर के महापौर
बीकानेर, 21 सितंबर। बीकानेर नगर निगम के महापौर चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी अनिल कल्ला ने बड़ी जीत दर्ज की है। सोमवार को हुए मतदान में अनिल कल्ला को कुल 50 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को 30 मत प्राप्त हुए। इस प्रकार कल्ला ने 20 वोटों के अंतर से चुनाव जीतकर बीकानेर के नए महापौर के रूप में नगर निगम की कमान संभाल ली है।
80 सदस्यीय नगर निगम में महापौर पद पर जीत के लिए 41 मतों की आवश्यकता थी। अनिल कल्ला ने बहुमत के आंकड़े से नौ वोट अधिक हासिल किए। परिणाम घोषित होने के बाद निर्वाचन अधिकारी ने उन्हें जीत का प्रमाण-पत्र सौंपा। कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने फूल-मालाओं के साथ उनका स्वागत किया तथा जीत का जश्न मनाया।
कांग्रेस के आंकड़े से आठ वोट अधिक मिले
नगर निगम के पार्षद चुनाव में कांग्रेस ने 42 वार्डों में जीत दर्ज की थी। महापौर चुनाव में पार्टी प्रत्याशी अनिल कल्ला को 50 वोट मिले, जो कांग्रेस के निर्वाचित पार्षदों की संख्या से आठ अधिक हैं। इससे स्पष्ट है कि उन्हें कांग्रेस के पार्षदों के अतिरिक्त निर्दलीय अथवा दूसरे खेमे के कुछ पार्षदों का समर्थन भी मिला।
दूसरी ओर, भाजपा के 27 पार्षद निर्वाचित हुए थे, जबकि उसके महापौर प्रत्याशी डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को 30 मत मिले। उन्हें भी पार्टी के निर्धारित आंकड़े से तीन वोट अधिक प्राप्त हुए। मतदान की गोपनीयता के कारण अतिरिक्त वोट किन पार्षदों ने दिए, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकती।
भाजपा के दावों के उलट आया परिणाम
महापौर चुनाव से पहले भाजपा नेताओं की ओर से निर्दलीय पार्षदों के समर्थन का दावा किया जा रहा था। भाजपा खेमे ने अपने पार्षदों के साथ निर्दलीयों को जोड़कर मुकाबले को रोचक बनाने की रणनीति बनाई थी। कांग्रेस के कुछ पार्षदों की कथित नाराजगी और संभावित क्रॉस वोटिंग को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा बनी हुई थी।
नतीजों में अनिल कल्ला को 50 वोट मिलने के बाद कांग्रेस की रणनीति सफल साबित हुई। पार्टी अपने पार्षदों को एकजुट रखने के साथ अतिरिक्त समर्थन जुटाने में भी कामयाब रही। वहीं भाजपा प्रत्याशी को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका।
बाड़ेबंदी और बैठकों के बीच चला सियासी संघर्ष
नगर निगम चुनाव परिणाम आने के बाद से ही दोनों प्रमुख दलों ने महापौर की कुर्सी के लिए जोड़-तोड़ तेज कर दी थी। कांग्रेस ने अपने विजयी पार्षदों को एकजुट रखने के लिए वरिष्ठ नेताओं की निगरानी में बैठकें कीं। पार्षदों को एक साथ रखकर पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान सुनिश्चित करने की रणनीति पर काम किया गया।
भाजपा ने भी अपने पार्षदों और समर्थक निर्दलीयों के साथ बैठकें कर जीत का दावा किया था। चुनाव से ठीक पहले तक दोनों पक्ष अपनी संख्या मजबूत होने की बात कहते रहे। हालांकि मतदान के बाद सामने आए 50–30 के परिणाम ने कांग्रेस की स्पष्ट बढ़त पर मुहर लगा दी।
तीन दशक लंबे राजनीतिक सफर का बड़ा मुकाम
अनिल कल्ला की जीत को केवल महापौर पद की चुनावी सफलता तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह उनके करीब तीन दशक लंबे राजनीतिक और सामाजिक सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव है। शहर की राजनीति में उनकी सक्रियता उस समय से रही है, जब वर्तमान में सक्रिय कई युवा चेहरे राजनीति की शुरुआत कर रहे थे।
वार्ड स्तर की क्रिकेट प्रतियोगिताओं और राजीव यूथ क्लब के कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने लंबे समय तक युवाओं के बीच अपनी पकड़ बनाई। विभिन्न सामाजिक आयोजनों तथा जनसंपर्क गतिविधियों में भी उनकी मौजूदगी लगातार दिखाई देती रही।
राजनीतिक दूरी के बाद दोबारा बढ़ी सक्रियता
डॉ. बीडी कल्ला की चुनावी हार के बाद एक समय अनिल कल्ला की सार्वजनिक राजनीतिक सक्रियता कम हो गई थी। वह कुछ समय तक प्रमुख राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहे, लेकिन अपने पुराने साथियों और कार्यकर्ताओं से उनका संपर्क बना रहा।
लंबे अंतराल के बाद उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में दोबारा सक्रियता बढ़ाई। पुराने कार्यकर्ताओं को जोड़ने के साथ युवाओं की नई टीम तैयार करने पर भी काम किया। इसी नेटवर्क ने नगर निगम चुनाव और बाद में महापौर चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कोरोना काल में जरूरतमंदों की सहायता
कोरोना महामारी के दौरान राजीव यूथ क्लब के माध्यम से जरूरतमंद परिवारों को राशन सामग्री तथा आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाने की गतिविधियों से अनिल कल्ला फिर सार्वजनिक रूप से सक्रिय नजर आए। इसके बाद शहर में आयोजित राजनीतिक, सामाजिक और जनहित से जुड़े कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ती गई।
इस दौरान उन्होंने अपने पुराने राजनीतिक दायरे को दोबारा मजबूत किया। नगर निगम चुनाव आते-आते उनकी सक्रियता और समर्थकों का नेटवर्क कांग्रेस संगठन के लिए महत्वपूर्ण बन गया।
वार्ड 73 से पार्षद बनने के बाद मिला बड़ा अवसर
नगर निगम चुनाव में कांग्रेस ने अनिल कल्ला को वार्ड संख्या 73 से प्रत्याशी बनाया था। टिकट मिलने के बाद उनके पुराने साथी और समर्थक चुनाव अभियान में सक्रिय हुए। पार्षद चुनाव जीतकर वह नगर निगम पहुंचे और इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें महापौर पद का प्रत्याशी घोषित कर बड़ा राजनीतिक दांव खेला।
महापौर प्रत्याशी बनाए जाने के बाद कांग्रेस के भीतर कई नामों को लेकर चली चर्चाओं पर विराम लगा। वरिष्ठ नेताओं और संगठन ने कल्ला के पक्ष में पार्षदों को एकजुट करने की जिम्मेदारी संभाली। अंततः 50 वोट हासिल कर उन्होंने पार्टी के फैसले को चुनावी जीत में बदल दिया।
परिवारवाद के आरोपों का किया था विरोध
पार्षद चुनाव जीतने और महापौर प्रत्याशी घोषित होने के बाद विरोधियों ने अनिल कल्ला पर परिवारवाद के आरोप भी लगाए थे। अनिल कल्ला ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि वह करीब 30 वर्षों से राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा जनता के बीच चुनाव जीतकर नगर निगम पहुंचे हैं।
उनका कहना था कि लंबे राजनीतिक सफर और चुनावी जीत को नजरअंदाज करके परिवारवाद का आरोप लगाना उचित नहीं है। अब महापौर चुनाव में मिली बड़ी जीत को उनके समर्थक इन आरोपों के जवाब के रूप में देख रहे हैं।
कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल
परिणाम घोषित होते ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं और अनिल कल्ला के समर्थकों में उत्साह छा गया। समर्थकों ने फूल-मालाएं पहनाकर उनका अभिनंदन किया और एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर जीत की बधाई दी। कांग्रेस नेताओं ने इसे पार्षदों की एकजुटता और संगठन की रणनीति की जीत बताया।
अनिल कल्ला की जीत के साथ ही बीकानेर नगर निगम की सत्ता पर कांग्रेस का कब्जा हो गया है। कभी अपनी यूथ टीम के साथ वार्डों में सक्रिय रहने वाला चेहरा अब नगर निगम की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंच गया है। उनके सामने अब शहर की सफाई व्यवस्था, सड़कों, सीवरेज, जलभराव, प्रकाश व्यवस्था और नगर निगम की आर्थिक स्थिति सुधारने जैसी बड़ी चुनौतियां होंगी।













