
संस्कृति को बनाए रखने की पहल: हर्षो के चौक में हुआ नवनिर्मित पाटे का पूजन, वरिष्ठ अधिवक्ता ओमप्रकाश हर्ष की प्रेरणा से नए लुक में नजर आया पाटा
बीकानेर। बीकानेर की पहचान सिर्फ अपने ऐतिहासिक किलों, हवेलियों और समृद्ध परंपराओं से ही नहीं, बल्कि यहां की अनूठी पाटा संस्कृति से भी है। यही वजह है कि इस नगरी को पाटा नगरी भी कहा जाता है। शहर के गली-मोहल्लों से लेकर बड़े चौक तक जगह-जगह बने पाटे आज भी सामाजिक मेल-मिलाप, संवाद और सामूहिक निर्णयों के साक्षी बने हुए हैं।
पाटा संस्कृति की इसी परंपरा की जीवंत मिसाल हर्षों के चौक में देखने को मिली। यहां वर्षों से लोगों की बैठकी का केंद्र रहा पुराना पाटा अब नए लुक में नजर आने लगा है। पाटे पर नियमित रूप से बैठने वाले लोगों ने इसकी सुध ली और सामूहिक अंशदान कर इसका नवनिर्माण करवाया। इसके नवनिर्माण के प्रेरक वरिष्ठ अधिवक्ता ओमप्रकाश हर्ष रहे। यह पहल बताती है कि अपनी परंपराओं को जीवित रखने के लिए सरकारी व्यवस्था का इंतजार जरूरी नहीं, बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति भी बदलाव ला सकती है। नवनिर्मित पाटे का मंगलवार रात विधिवत पूजन किया गया। किशोरी तारिका हर्ष के हाथों पूजन करवाया गया। कुमकुम से स्वास्तिक बनाकर पूजा-अर्चना की गई और इसके बाद उपस्थित लोगों को मिठाई का प्रसाद वितरित किया गया। पूजन के साथ ही पाटे पर एक बार फिर पुरानी बैठकी और आपसी संवाद की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प भी नजर आया।
बोले वक्ता- नई पीढ़ी तक पहुंचे पाटा संस्कृति के संस्कार
इस अवसर पर अपने उद्बोधन में वरिष्ठ खेल लेखक नूतन हर्ष ने कहा कि बीकानेर के पाटे बैठकबाजी का स्थान नहीं है बल्कि इन्हें मोहल्ले के लोगों का साझा आंगन कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहां सुबह से शाम तक बुजुर्गों की बैठकी जमती है। यहां पर घर-परिवार की बातों से शुरू होने वाली चर्चाएं शहर, समाज, नगर, राज्य और देश-दुनिया के मुद्दों तक पहुंच जाती हैं। कई बार इन्हीं बैठकों में समस्याओं के समाधान भी निकल आते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ओम प्रकाश हर्ष ने कहा कि आधुनिक दौर में पाटा संस्कृति का एक रोचक पहलू यह भी है कि इसे मोहल्ले का अनौपचारिक ‘सीसीटीवी कैमरा’ कहा जा सकता है। गली में कौन आया, कौन गया, कहां क्या हो रहा है और किसे किस मदद की जरूरत है, इसकी जानकारी पाटे पर बैठे लोगों को रहती है। इस तरह पाटा सामाजिक निगरानी के साथ आपसी सहयोग और अपनत्व का केंद्र भी बना हुआ है। इसलिए पाटा संस्कृति को बनाए रखना बहुत जरूरी है। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राधा कृष्ण हर्ष ने कहा कि इन पाटों पर शोकाकुल परिवारों की नियमित बैठके यानी शोक सभाएं से लेकर राजनीतिक सभाएं तक भी होती है। यह जनसंवाद का बड़ा माध्यम है इसको बचाए रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह हमारे पूर्वजों की निशानी है।
वरिष्ठ उद्घोषक रविंद्र हर्ष ने कहा कि पाटे के नवनिर्माण की यह पहल केवल एक स्थान को नया रूप देने तक सीमित नहीं है। यह उस सामाजिक विरासत को सहेजने का प्रयास है, जिसमें बुजुर्गों का अनुभव, युवाओं की भागीदारी और मोहल्ले की सामूहिकता एक साथ दिखाई देती है। वरिष्ठ पत्रकार अनुराग हर्ष ने बताया कि बदलते समय में जब लोगों के बीच संवाद के अवसर कम होते जा रहे हैं, तब हर्षों के चौक का यह पाटा याद दिलाता है कि कभी-कभी समाज को जोड़ने के लिए किसी बड़े मंच की नहीं, बस एक साझा बैठकी की जरूरत होती है।
ये रहे मौजूद
इस अवसर पर नूतन कुमार हर्ष एडवोकेट ओमप्रकाश हर्ष एडवोकेट प्रेमनारायण हर्ष, वरिष्ठ उद्घोषक रविंद्र हर्ष, वरिष्ठ पत्रकार अनुराग हर्ष, राजेंद्र व्यास, मनोज व्यास, प्रमोद आचार्य, मदनमोहन हर्ष, कैलाश हर्ष, युगलकिशोर हर्ष, नंदकिशोर हर्ष, राकेश कुमार, राजेश हर्ष, विजय कुमार हर्ष व राजेन्द्र हर्ष सहित अनेक लोग मौजूद रहे।













