
शनिवार को जगद्गुरु रामभद्राचार्यजी महाराज ने भरत चरित्र का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जब भरतजी अयोध्या पहुंचे तो उन्हें न पिता दिखे, न रामजी दिखे, कोई भी प्रसन्नता के भाव या किसी भी जीव में हर्ष नहीं दिख रहा था। माता कौशल्या से जब पूछा तो उन्होंने कहा कि यहां सूर्य भी नहीं और चंद्रमा भी नहीं है और आगे अनेक वृतांत के बाद राजसिंहासन ठुकराते हुए भरतजी निकल पड़े रामजी को मनाने। जगद्गुरु ने बताया कि जो राम प्रेम से मन भर देता है उसे भरत कहते हैं। वनवासी राम-लक्ष्मण और जानकी से मिले भरतजी और 14 वर्ष के लिए रामजी से पादुका लेकर भरत का लौटने के वृतांत ने जगद्गुरु सहित उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं के हृदय को झकझोर दिया।
श्रीसरजूदासजी महाराज को मिली राष्ट्रीय संत की उपाधि
महंत भगवानदासजी महाराज ने बताया कि अखाड़ा परिषद चतुष्सम्प्रदाय द्वारा रामझरोखा कैलाशधाम के पीठाधीश्वर श्रीसरजूदासजी महाराज को राष्ट्रीय संत की उपाधि प्रदान की गई। अखिल भारतीय पंच दिगम्बर अखाड़ा राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीरामकिशोरदासजी महाराज ने राष्ट्रीय संत से श्रीसरजूदासजी महाराज को अलंकृत किया और जगद्गुरु पद्मविभूषित स्वामी रामभद्राचार्यजी महाराज ने तिलक निकाल कर अभिनन्दन किया। इस दौरान परमपूज्य गुरु श्रीरामदासजी महाराज, श्रीमद्भगवत् अग्रपीठाधीश्वर स्वामी राघवाचार्यजी महाराज, बाहुबल देवाचार्य श्रीबलदेवाचार्यजी महाराज, श्रीरामदासजी मुरारपुर धाम, श्रीपरशमदासजी, श्रीप्रियमदासजी महाराज, अखिल भारतीय पंचनिर्वाणी अखाड़ा महंत श्रीधर्मदासजी महाराज, जगद्गुरु रामनंदाचार्य स्वामी रामदिनेशा महाराज, महामंडलेश्वर श्रीपरमेश्वरदासजी महाराज, श्रीकेशवदासजी महाराज सहित अनेक संत-महात्माओं ने श्रीसरजूदासजी महाराज का अभिनन्दन कर मंगलकामनाएं दी।














