

वट पूजा पर विशेष -यमराज पर भारी, शक्तिशाली नारी
भारत एक ऐसा देश है जहां पर प्राण को, प्राणी को लाभ पहुंचाने वाले चाहे पौधे हो या पशु या प्रकृति निर्मित पहाड़, झरने ,नदियां, चांद, सितारे, सूरज आदि हों उन्हें देवी, देवता मानकर पूजा जाता है। इसी श्रृंखला में एक दिलचस्प त्योहार वट सावित्री व्रत का है। नारियां ही सभी त्यौहार बड़े उत्साह से व्रत से पूजा पाठ से करती हैं। इसी संदर्भ में सत्यवान सावित्री की कथा बड़ी रोचक एवं नारी की शक्ति को प्रदर्शित करती है। वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को मनाया जाता है. पृथ्वी पर असंख्य प्रकार के पेड़, पौधे हैं , जो वातावरण को शुद्ध बनाए रखते हैं, और प्रकृति के साथ तालमेल बनाये रखते हैं , भारतीय परम्परा में अनेक पेड़ पौधों की पूजा की जाती है, जो समय समय पर कुछ खास हो जाते है। जैसे तुलसी , पीपल , वट, खेजड़ी आदि पौधों, वृक्षों की पूजा की जाती है ,व्रत व पूजा से कुटुंब संपन्नता ,सुख, शांति बनी रहती है । और परंपरागत चली आ रही यह परंपरा पर्यावरण के लिए अद्भुत रक्षा करने वाली होती है । जब हम इनकी पूजा करेंगे तो इनको किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे। वृक्ष की पूजा करके उस पर धागा लपेटा जाता है और परिक्रमा की जाती है , जिससे उस वृक्ष के नीचे सकारात्मक किरणें मिल जाती हैं। यह वृक्ष ऑक्सीजन का भरपूर प्रसार करते हैं। जिससे स्वास्थ्य में भी वृद्धि होती है । पुराणों के अनुसार वट वृक्ष के अग्रभाग में महादेव , बीच में विष्णु और मूल में ब्रह्मा का निवास होता है , भगवान बुद्व को भी इस वृक्ष के नीचे बैठकर ज्ञान मिला था। इसका अनेक दवाइयों में प्रयोग किया जाता है , यह पेड़ अत्यंत घना होता है इसलिए इस पेड़ पर अनेक पक्षियों का निवास होता है ,व उनका भोजन भी मिलता है , वहीं पर्यावरण को शुद्व रखने में महत्पूर्ण होता है , यात्रियों को तपन से बचने के लिए यह अति उत्तम स्थान है, इस दिन निर्धन व जरुरतमंदों को दान पुण्य करने से पुण्य मिलता है और मनोकामना पूर्ण होती है। वट सावित्री व्रत में अपने पति की लम्बी आयु की कामना व सुखमय जीवन के लिए विवाहित महिलाएं यह व्रत रखती हैं , सावित्री की कथा का श्रवण करती हैं, जिसने यह जानते हुए भी कि सत्यवान की उम्र कम है फिर भी उसने शादी की और जल्दमृत्यु हो जाने पर यमराज का पीछा किया , तो यमराज ने उसकी भक्ति से खुश होकर वचन देना शुरु किया , लेकिन सत्यवान को जीवन दान देने को छोड़कर , अंत में कई वचन लेने के बाद सावित्री ने 100 संतानों व सौभाग्यवती होने का वरदान माँग लिया , तो यमराज ने बिना सोचे समझे वर दे दिया और यमराज जाने लगे तब सावित्री ने पतिव्रता पत्नी होने की बात कही , तब यमराज को सौभाग्यवती का वरदान देने के कारण सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े , सावित्री वट वृक्ष के पास आई और अपने पति को जीवित पाया , इस प्रकार पतिव्रता स्त्री ने अपने पति के प्राण बचा लिए। यह कहानी हमें सीख़ देती है कि अगर सच्चे मन से भगवान की सेवा की जाये और समय समय पर परम्पराओं के अनुसार पूजा पाठ , दान पुण्य किया जाये , अच्छे विचारो का पालन किया जाये , समाज हित में कार्य किये जाएँ तो कारण से इस प्रकार की कथाएं एवं व्रत वगैरा जोड़े गए हैं जिससे हम उनकी रक्षा कर सके।
के पी अग्रवाल , हैदराबाद














