
देश के लिए जीना
56 इंच सीना,
विष साफ करने को
विष भी पीना।
अमूल्य वो नगीना।।
अमूल्य वो नगीना।।
वो तो दुरुस्त है
लौह पुरुष है,
न डरे कांटों से
हरदम हष्ट पुष्ट है,
श्रम से बहाए वो पसीना।
अमूल्य वो नगीना।।
अमूल्य वो नगीना।।
जिन्हे दी सौगात
उनसे खाई है मात,
वार पीठ पीछे
हो रही बरसात,
पर मधुर सुनाएं,वो तो वीणा
अमूल्य वो नगीना।।
अमूल्य वो नगीना।।
कैसे कोई गिरा दे
फौलादी इरादे,
एक-एक करके जुड़ें
छोटे बड़े प्यादे,
स्वच्छ हो जाएगा,धुंधला वो आईना।
अमूल्य वो नगीना।।
अमूल्य वो नगीना।।
कीचड़ में खिले कमल
गुणों में रहे अव्वल,
जो वादों से अटल
खिलता रहे वह कमल,
कमल है करिश्मा।
अमूल्य वो नगीना।।
अमूल्य वो नगीना।।
देश के लिए जीना,
56 इंच सीना।
अमूल्य वो नगीना।।
लेखिका :- गीता अग्रवाल हैदराबाद















