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धार्मिक स्थलों का सार्वजनिक उत्सवों में उपयोग नहीं करें-आचार्यश्री जिन पीयूष सागर सूरीश्वरजी


बीकानेर,  6 अगस्त। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ के आचार्यश्री जिन पीयूष सागर सूरिश्वरजी के सान्निध्य में चल रहे ढढ्ढा चौक की आगम वाटिका में श्री 45 आगम तप अनुष्ठान में मंगलवार को प्रश्न व्याकरण सूत्र की आराधना की गई। आयम्बिल तप करने वाले 16 श्रावक-श्राविकाओं का अभिनंदन विचक्षण महिला मंडल की वरिष्ठ श्राविका मूलाबाई दुग्गड़, जिनेश्वर महिला परिषद की संरक्षक संतोष नाहटा, अंजू देवी मुसरफ व  जिनेश्वर युवक परिषद के अध्यक्ष संदीप मुसरफ ने किया।
धर्मचर्चा में आचार्यश्री जिन पीयूष सागर सूरिश्वरजी ने जैनागमों में 10 वें अंग सूत्र का शास्त्रीय नाम ’’पण्हावागरणम्’ है। इसके अनेक पद है। उनमें से श्लोक प्रमाण में वर्तमान समय में इस सूत्र का अवशेष हिस्सा मिलता है, बहुत सा भाग उपलब्ध नहीं है। इस सूत्र का एक श्रुतस्कंध हैं और उसके दस अध्ययन है। उसमें प्रारंभ के पांच अध्ययनों में अहिंसा आदि पांच संवरों का वर्णन है। संक्षिप्त में आस्रव और संवर तत्व का वर्णन है। श्री नंदी सूत्र में प्राप्त उल्लेख अनुसार 460800 पद के इस सूत्र मे ,विद्या अतिशय तथा अनेक महा चमत्कारी विद्या मंत्र तथा नाग कुमार आदि भवनपति देवों के साथ मुनिवरों की बातचीत का समावेश है। तीसरे महाव्रत के अधिकार में साधु के जाने से यदि घर के मालिक को अप्रीति होती हो तो वहां आहार आदि के लिए नहीं जाना चाहिए। बुधवार को श्री 45 आगम तप के 11वें दिन विपाक सूत्र की आराधना की जाएगी।
आचार्य श्री धर्म चर्चा में कहा कि वर्तमान में कई लोग धार्मिक, आध्यात्मिक स्थलों का उपयोग मनोरंजन, जन्म दिन पार्टी, सगाई व विवाह आदि कार्यक्रमों के लिए करने लगे है। धार्मिक स्थलों का सांसारिक उत्सवों व कार्य में उपयोग लेना सर्वथा अनुचित है। मंदिर, मुनि व साध्वी वृंद के प्रवास, उनके साधना, आराधना व भक्ति स्थल में कोई सांसारिक गतिविधियां करें तो उसके निमंत्रण को अस्वीकार करें। बीकानेर के मुनि सम्यक रत्न सागर ने आचार्य श्री के विषय को विस्तार से विश्लेषण करते हुए कहा कि धार्मिक स्थल की मर्यादा, शुचिता रखना सबका धार्मिक, नैतिक, सामाजिक दायित्व है। श्रावक-श्राविकाएं अपने दायित्व का निर्वहन कर पाप कर्म के बंधनों से बचे।
मुनिवृंद के सान्निध्य में दो बालकों के अट्ठाई तप की अनुमोदना 
बीकानेर, 6 अगस्त। रांगड़ी चौक की तपागच्छीय पौषधशाला  मेंं मंगलवार को  मुनि पुष्पेन्द्र विजय व मुनि श्रुतानंद विजय के सान्निध्य में 8 वर्ष की आयु में 8 दिन की तपस्या (अट्ठाई) करने वाले बालक विराज सिपानी विनय व रश्मि सिपानी व पौत्र ललित सिपानी व साढ़े नौ वर्षीय बालक अर्हम सिपानी पुत्र गौतम रश्मि सिपानी पौत्र सरोज-लीलम सिपानी की तप की अनुमोदना की गई। अर्हम सिपानी का बुधवार को अभिनंदन किया जाएगा। 
श्री आत्मानंद जैन महासभा की ओर से विराज सिपानी का अभिनंदन सुरेन्द्र बद्धाणी जैन, शांति लाल कोचर व अजय बैद ने किया। मुनिवृंद ने कहा कि इतनी छोटी सी आयु में 8 दिनों तक केवल सीमित जल ग्रहण कर तपस्या करने वाले इस बालक ने जैन धर्म की प्रभावना की है। जो श्रावक-श्राविकाएं तप में असमर्थ है उनको तपस्या की अनुमोदना कर पुण्यार्जन करना चाहिए।
म्ांदिर श्री पद्म प्रभु ट्रस्ट के अध्यक्ष लीलम सिपानी ने बताया कि बालक अर्हम सिपानी का वरघोड़ा बुधवार को लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर के भगवान नेमिनाथ मंदिर में दर्शन वंदन करते हुए तपागच्छ पौषधशाला मेंं मुनिवृंद से तथा ढढ्ढा चौक में जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ के आचार्यश्री पीयूष सागर सूरीश्वरजी प्रवचन पांडाल में पहुंचकर आशीर्वाद प्राप्त करेगा।

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Gordhan Soni

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