बीकानेर, 8 मई। विश्व थैलेसीमिया दिवस पर शुक्रवार को जस्सूसर गेट के बाहर डॉ.श्याम अग्रवाल बाल एवं शिशु रोग अस्पताल व अनुसंधान केन्द्र में निःशुल्क जागरूकता एवं जांच शिविर हुआ। शिविर में थैलेसीमिया रोग से पीड़ित बच्चों व उनके अभिभावकों को इस रोग के बचाव के संबंध में परामर्श दिया।
बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ.श्याम अग्रवाल ने शिविर में बताया कि भारत में प्रतिवर्ष दस हजार से अधिक बच्चे थैलेसीमिया रोग से पीड़ित पैदा होते है। उन्हेंं पूरी जिन्दगी 15-20 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है,। रोग से पीड़ित बच्चों का अधिकतर समय अस्पताल में चिकित्सा में ही बीतता है। बच्चा व उनके अभिभावक मानसिक, शारीरिक व आर्थिक परेशानी का सामना करते है।
डॉ.अग्रवाल ने बताया कि थैलेसीमिया बीमारी को शत प्रतिशत रोका जा सकता है। थैलेसीमिया किस्मत या पूर्व जन्मों के कर्मों की बीमारी नहीं, बल्कि जानकारी की कमी की बीमारी है। अगर दो ‘कैरियर’ आपस में शादी कर लें, तो 25 प्रतिशत खतरा है कि बच्चा ज़िंदगी भर थैलेसीमिया से तड़पेगा। लेकिन अगर शादी या गर्भधारण से पहले एक जाँच करा लें, तो हम एक ही पीढ़ी में थैलेसीमिया खत्म कर सकते है। सरकारी व निजी अस्पतालों में थैलेसीमिया बीमारी के ईलाज व परामर्श की पूर्ण सुविधा है। थैलेसीमिया रोग के बचाव के लिए अविवाहित युवक-युवति जीवनसाथी को हां कहने से पहले, नव विवाहित दम्पति बच्चा प्लान करने से पहले, गर्भवती महिलाएं पहली तिमाही में खून की जांच करवावें तथा चिकित्सकों की सलाह से थैलेसीमिया के रोकथाम के लिए उचित परामर्श के साथ इलाज करवावें ।
मुख्य अतिथि राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाचार्या डॉ. वीणा तंवर ने बताया कि थैलेसीमिया का इलाज भारत के प्रमुख सरकारी और निजी अस्पतालों में उपलब्ध है, जिसमें ब्लड ट्रांसफ्यूजन, आयरन चेलेशन थेरेपी और अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण शामिल है। अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण इस बीमारी का एकमात्र स्थायी इलाज है, जो विशेष रूप् से सगे भाई बहन से मिलान होने पर 90-95 प्रतिशत सफल होता है। भारत सरकार की थैलेसीमिया बाल सेवा योजना के तहत बीएमटी के लिए 10 लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। डॉ.वीणा तंवर ने इस अवसर पर अपने स्कूल के स्टाफ व विद्यार्थियों के माध्यम से थैलेसीमिया रोग के बचाव के बारे में जागरूकता कार्य करने का संकल्प दोहराया तथा इस तरह के कार्यक्रम सरकारी शिक्षण संस्थाओं में करने का सुझाव दिया। जिसे डॉ.श्याम अग्रवाल ने सहर्ष स्वीकार किया। इस अवसर पर शिव सोनी, शिक्षिका श्रीमती सुधा व्यास ने भी विचार व्यक्त किए तथा शिविर का उपयोगी बताया ।
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