बीकानेर, 21 अगस्त। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ के आचार्यश्री जिन पीयूष सागर सूरिश्वरजी के सान्निध्य में श्री सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट व श्री जिनेश्वर युवक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को प्रवचन पंडाल में जयपुर के 33 दिन की तपस्या करने वाले तपस्वी नवीन कुमार भांडिया का अभिनंदन बीकानेर के 31 दिन की तपस्या करने वाले कन्हैयालाल भुगड़ी व 11 दिन की तपस्या करने वाले रौनक बरड़िया ने किया। आचार्यश्री ने मांगलिक सुनाकर और तपस्या की अनुमोदना के गीत का मुखड़ा सुनाकर तपस्वियों को आशीर्वाद दिया।
श्री सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट के मंत्री रतन लाल नाहटा व श्री जिनेश्वर युवक परिषद के अध्यक्ष संदीप मुसरफ, मंत्री मनीष नाहटा ने बताया कि देव, गुरु व धर्म के प्रति समर्पित रायपुर के सुश्रावक संजय कोचर का बहूमान श्री जिनेश्वर युवक परिषद के कोषाध्यक्ष अभय बांठिया, हीरालाल बांठिया व धीरज खटोल ने पगड़ी,दुपट्टा व श्रीफल से किया। प्रवचन पंडाल में मंगलवार रात आयोजित तप वंदनावली में फलोदी की कोमल गोलछा ने नवकार महामंत्र के साथ भक्ति गीतों का शुभारंभ किया। उन्होंने भगवान महावीर, भगवान पार्श्वनाथ, दादा गुरुदेव की स्तुति व वंदना के भक्ति के तरानों से देर रात तक श्रावक-श्राविकाओं को भक्ति रस में सराबोर रखा।
आचार्यश्री जिन पीयूष सागर सूरीश्वरजी ने धर्मचर्चा में कहा कि चोरी, बेईमानी, प्रपंच, माया, छल कपट से अर्जित धन को दान, पुण्य व धर्म कार्य में लगाने से सार्थक पुण्य परिणाम नहीं मिलता। सामर्थ्यानुसार नीति, नेकी व न्याय से अर्जित धन, धर्म व पुण्य कार्य में लगाने से वह अधिक फलदायी होता है। मुनि सम्यक रत्न सागर ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार पाप व पुण्य के सिद्धान्त को समझें तथा पाप कर्मों से बचे तथा पुण्यों का संचय करें। उन्होंने कहा कि पाप कर्म उदय होने पर व्यक्ति का मान सम्मान कम होता है तथा अंतःकरण से प्रभु भक्ति नहीं होती। देव, गुरु व धर्म तथा तपस्या, की अनुमोदना तथा स्वधर्मी भक्ति राग व द्वेष के कारण नहीं करना पापानुपाप बंध को करना है। जिन शासन की प्रभावना करने वालों की अनुमोदना करनी चाहिए।
आतुर प्रत्याख्यान प्रकीर्णक ( पयन्ना ) सूत्र की आराधना
आचार्यश्री के सान्निध्य में चल रहे श्री 45 आगम तप में बुधवार को आतुर प्रत्याख्यान प्रकीर्णक ( पयन्ना ) सूत्र का जाप व आराधना की गई। आचार्यश्री ने धर्मचर्चा में बताया कि इस सूत्र में रोग ग्रस्त देह की असीम पीड़ा से पीड़ित आत्मा की आराधना करवाने के लिए करने योग्य पच्चक्खाण का विषय संकलित है। देश विरतिपने में मृत्यु होना यह बाल पंडित मरण है । सर्वविरति धर मुनियों के मरण को पंडित मरण कहा जाता है। इसमें मरण के अनेक भेदों का सविस्तार वर्णन देखने मिलता है। मरणासन्न आत्मा को स्व की आराधन किस प्रकार करना है इसके वर्णन के साथ स्वयं के किए हुए दुष्कृत्यों को याद कर गुरु महाराज के समझ आलोचन-निंदन करने का विधान है।













