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सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी! — मनोहर चावला वरिष्ठ पत्रकार
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अनाड़ी फ़िल्म का यह गीत आज भी कितना सार्थक है गीत के बोल—- सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी- सच है दुनिया वालो कि हम है अनाड़ी? क्योंकि हम जानते है कि हम मूर्ख बन रहे है और अपना वोट सही आदमी को नहीं दे पा रहे है और बहाव में बहकर हम हर दफ़ा चूक जाते है। और फिर कोसते हुए हाथ मलते रहते है। क्योंकि सब कुछ यथावत रहता है कोई बदलाव नहीं, कोई विकास नहीं? अपने नगर में होते विनाश कों देखकर हमे रोना आता है। जबकि हमारे द्वारा चुने हुए नेता और उनकी बनाई सरकार अच्छी तरह जानती है कि शहर में शराब की दुकाने आठ बजे के बाद भी खुली रहती है। सूखा दिवस ( ड्राई- डे) पर भी शराब पिछले दरवाजे से बिकती है। ये हमारे नेता और सरकार यह भी जानती है कि ड्राइविंग लाइसेंस, वाहनो का रजिट्रेशन,व आर टी ओ से संबंधित अन्य कागजात दलालो के मार्फ़त ही बनते है। ये नेता यह भी जानते है कि नाके के टोल टैक्स पर अवैध वसूली होती है। और उनकी सरकार जानते हुए भी मौन रहती है यह नेता यह भी जानते है कि निगम या न्यास में भूमि रूपांतरण या पट्टा लेने के लिए नज़राना देना होता है पटवारी भी भूमि के नाप- तौल में अपना हिस्सा लेता है। लेकिन नेता और सरकार चुप ही रहती है। वे यह भी जानते है कि ट्रांसफर के लिए डिजायर करवाने हेतु प्रार्थी से कुछ भेंट लेनी होती है। फिर इस पर वे क्या बोले? न्यायालय में भी पेशकारों को मुकदमे की तारीख देने के लिए खुश करना पड़ता है। हम सब यह भी जानते है कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए सम्बन्धित अधिकारियों को राजी रखना होता है। ये बात किसी से छुपी नहीं है खासकर नेताओ से। हम यह भी अच्छी तरह जानते है कि अभियंताओं का सड़क निर्माण, भवन निर्माण में भी ठेकेदारों से हिस्सा फिक्स होता है। लेकिन हम क्या कर सकते है। सरकार यह भी जानती है कि कर्मचारी कभी भी समय पर ऑफिस नहीं आते, अपनी सीटो पर नहीं मिलते, और परिवादी के काम बिना रिश्वत के नहीं होते! लेकिन फिर भी इनका कुछ नहीं होता? सरकार यह भी जानती है कि अधिकांश व्यापारी जीएसटी की चोरी करते है लेकिन उसका एक भाग सम्बंधित अधिकारी या ऊपर तक जाता है। मिलावटी खाद्य पदार्थ और नकली मार्का के उत्पादन को सरकार अच्छी तरह जानती हैं। लेकिन सरकार चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है चुनाव लड़ने के लिए पैसों की जरूरत होती है। अत: सब जानते हुए भी वो आँखे मूँदे रहती है। दिखावे के तौर पर कुछ जगह छापे मारकर वा – वाही लूट लेती है। बाक़ी सिस्टम में बदलाव कभी नहीं लाती। सालों से चली आ रही परम्परा को कोई भी नेता, मंत्री या फिर सरकार तोड़ नहीं पाती। आप ख़ुद देखते ही होंगे कि सरकारी गाड़ी पर नेताओ के और अधिकारियों के बच्चे स्कूल जाते है उनकी पत्नियाँ साहब की गाड़ी पर ही किटी पार्टी— बाज़ार में मार्केटिंग करने जाती है। बेटे- बेटिया सरकारी गाड़ी से ही पिकनिक पर जाते है। दोस्तों और रिश्तेदारों को घुमाने के लिए ही सरकारी गाड़ी का पूरा सद्पयोग होता है गाड़ी की लॉकबुक में पब्लिक से जनसंपर्क और गाँवो के भ्रमण – जनसुनवाई हेतु जाना लिखा जाता है। क्योंकि इन्हें कोई नहीं पूछने वाला! नेता यह सब जानते हुए भी मिली- भगत से ब्यूरोक्रेशी के आगे नतमस्तक है। बदलते वक्त के साथ सरकार के नौकर ही उनके दामाद बन जाते है। दिन – ब- दिन चोरो और बेईमानो का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है। और ईमानदारी कहीं नज़र नहीं आती। चारों और भ्रष्टाचार का नंगा नाच हो रहा है। खाद नक़ली, दवाईयां नक़ली, जाँचे नक़ली, दूध- घी नक़ली- किस किस वस्तु की बात करे— आपको अब कोई भी चीज़ शुद्ध नहीं मिल सकती। आदमी भी शुद्ध नहीं रहा। उसका ख़ून भी शुद्ध नहीं रहा। हम नक़ली और मिलावटी खाद्य पदार्थ खाकर असली कैसे रह सकते है ? हमारी नस- नस में भ्रष्टाचार, हमारे खून में लालच,बेईमानी और झूठ मिक्स हो गया है। ऊपर से लेकर नीचे तक, नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक, अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक, व्यापारी, बिल्डर्स, ठेकेदार अधिकांश भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मानने लगे है। अब सवाल उठता है कि नेता और उनकी सरकार क्यो नहीं, भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में बदलती? टूटती है सड़के, गिरते है पुल, क्रेश होते है हवाई जहाज़ और मरते है लोग— तो क्या फ़र्क़ पड़ता है। यह जानते हुए भी नेताओ पर कोई असर नहीं होता? सरकार धड़ल्ले से चल रही है और चलती रहेगी। नैतिकता और जनसेवा अब इतिहास की बाते बन गई है। लालबहादुर शास्त्री और डॉ. अब्दुल कलाम को हमारा सलाम! एक बार शास्त्री जी के बेटे ने सरकारी गाड़ी से अपना निजी काम किया तो शास्त्री जी ने अपने पॉकेट से गाड़ी के पेट्रोल का बिल अदा किया। इसी प्रकार राष्ट्रपति डॉ. कलाम साहब स्टेशन पर अपने रिश्तेदारों को लेने टैक्सी में गए और उन्हें लेकर टैक्सी में ही राष्टपति भवन लाए। लेकिन आज आपको कोई ईमानदार व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा! अब नेता बदल गये है। अधिकारी – कर्मचारी की भावनाएं भी बदल गई है। समा भी बदल गया है। फ़िल्म नास्तिक का गाना आपको याद दिला दू— देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान! सूरज न बदला, चाँद न बदला, न बदला ये आसमान! कितना बदल गया इन्सान! लेकिन मैं तो यही कहूँगा कि इन सबके लिए हम सब जिम्मेदार है हम सब बदल गये है क्योंकि हमने अपने अमूल्य वोट का सदुपयोग नहीं किया और हम भरोसे में यही गुनगुनाते रहे कि सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी, सच है दुनियावालो हम है अनाड़ी! और हमेशा अनाड़ी ही रहे?

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दिलीप गुप्ता

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