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अष्ट प्रातिहार्य महोत्सव में जैन धर्म के तीर्थंकरों के साथ जुड़े शुभ 8 लक्षणों (मंगल चिन्हों) की संगीतमय प्रस्तुति
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अष्ट प्रातिहार्य महोत्सव में जैन धर्म के तीर्थंकरों के साथ जुड़े शुभ 8 लक्षणों (मंगल चिन्हों) की संगीतमय प्रस्तुति

बीकानेर, 20 जुलाई।
गच्छाधिपति आचार्य प्रवर श्री जिन मणि प्रभ सूरीश्वरजी महाराज के आज्ञानुवर्ती गणिवर्य श्री मेहुल प्रभ सागर म.सा., मंथन प्रभ सागर, बाल मुनि मीत प्रभ सागर, बीकानेर की साध्वी दीपमाला श्रीजी व शंखनिधि के सान्निध्य में रविवार को ढढ्ढा कोटड़ी में भगवान के अष्ट प्रातिहार्य महोत्सव व दोपहर बच्चों का शिविर हुआ।
सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट व अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद की बीकानेर इकाई की ओर से श्री संघ के सहयोग से चातुर्मास में अष्ट प्रतिहार्य की प्रस्तुति पहली बार हुई। साध्वी श्री शंख निधि ने सभी अष्ट प्रातिहार्य के महत्व को बताया। वहीं साध्वी वृंद के साथ सुनील पारख, ट्विंकल नाहटा व अरिहंत नाहटा ने भक्ति गीतों की प्रस्तुति से श्रावक-श्राविकाओं को करीब सवा घंटे तक भाव विभोर रखा।
साध्वी श्री शंख निधि म.सा. ने बताया कि आचार्य मानतुंग ने भक्तामर स्तोत्र के श्लोक 28 से 35 में इन अष्ट प्रातिहार्य (मंगल चिन्हों) का अद्भूत वर्णन किया है। उन्होंने बताया कि जैन धर्म में 8 प्रतिहार्य जैन धर्म के तीर्थंकरों के साथ जुड़े शुभ 8 लक्षण हैं। यह लक्षण तब प्रकट होते है जब साधक केवलज्ञान यानि पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है। आठ प्रातिहार्य में अशोक वृक्ष सहनशीलता और शांति का, सिंहासन शक्ति और अधिकार का, तीन छत्र तीनों लोकों का, चामर ( चंवर ) सांसारिक मोह-माया से मुक्ति का, भामंडल यह दिव्य प्रकाश का घेरा है, जो तीर्थंकर भगवान के चारों और फैला रहता है। देव दुंदुभि यह देवों की ओर से बजाया जाने वाला एक वाद्य यंत्र है, जो तीर्थंकर भगवान के आगमन की घोषणा करता है। पुष्पवृष्टि देवताओं की ओर से की जाने वाली फूलों की वर्षा है। दिव्य ध्वनि ध्वनि यह तीर्थंकर भगवान का शाश्वत सत्य संदेश है, जो सभी प्राणियों को सुनाई देता है।
साध्वीश्री शंख निधि ने बताया कि अशोक वृक्ष, चौसठ चंवर, भाव मंडल, देव दुदुंभी वादन, तीन छत्र, पुष्प वृष्टि, दिव्य ध्वनि व सिंहासन ये परमात्मा की प्रतिमा के पास रखे जाते है। अष्ट मंगल मांगलिक द्रव्य है, जो किसी भी शुभ कार्य में रखे जाने चाहिए, इन्हें घर में भी रख सकते है। इनमें श्रृंगार झारी, बीजना (पंखा), कलश, दर्पण, चंवर, स्वास्तिक, ध्वजा और छत्र।
उन्होंने बताया कि परमात्मा की भक्ति में जुड़ने से श्रेष्ठ शक्ति से हम जुड़ते है। वास्तविक नृत्य परमात्मा के सामने चंवर लेकर भाव से नृत्य करने से संसार के सामने नाचना नहीं पड़ता। मोहनीय कर्म हटने पर सिद्धत्व की प्राप्ति होती है। तीन लोकों के नाथ परमात्मा से मेरा पन रखे। हर वक्त सोच व चिंतन रखे की परमात्मा मेरे तथा मैं परमात्मा का हूं। संगीतमय प्रस्तुति के दौरान ’’ हर साल शिखरजी में, तेरी एक हाजरी हो। मुझे वहीं रोक लेना जब सांस आखरी हो’’ । आदि भजनों की प्रस्तुतियां दी गई।
बच्चों का शिविर
ढढ्ढा कोटड़ी में रविवार को दो वर्गों में बच्चों का शिविर आयोजित किया गया। अखिल भारतीय खरतरगच्छ महिला परिषद की अध्यक्ष मनीषा खजांची व मंत्री लीला बेगानी ने बताया कि 7 से 12 वर्ष तक के बच्चों को मुनि मंथन प्रभ सागर म.सा ने 24 तीर्थंकर भगवान व उनके लाछंन (चिन्ह) तथा प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के बारे मेंं बताया। वहीं बड़े बच्चों की रात्रि भोजन त्याग के बारे में भाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई। साध्वीश्री शंखनिधि श्रीजी ने आठ कर्मों से अवगत करवाया।

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