



बीकानेर, 28 अक्टूबर। रांगड़ी चौक के सुगनजी महाराज के उपासरे में मंगलवार को चातुर्मासिक प्रवचन मे गणिवर्य मेहुल प्रभ सागर म.सा. ने कहा कि जैन तत्वज्ञान जीव ( आत्मा ) और अजीव (निर्जीव) दो मूल तत्वों पर आधारित है, जो सिखाता है कि आत्मा शरीर से अलग है और कर्मों के प्रभाव से मुक्त होकर ज्ञान और आत्म नियंत्रण के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि जीव, अजीव, आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष के तत्व जीवन की प्रकृति और मुक्त के मार्ग को समझाते है। जीव आत्मा और अजीव के माध्यम से आश्रव कमों का आत्मा में आना होता है। इसके कारण बंध (कर्मों का आत्मा से चिपकना होता है।) संवर नए कर्मों को रोकना और निर्जरा यानि पुराने कर्मों का क्षय करना, के माध्यम से इन बंधनों से मुक्ति पाई जा सकती है। उन्होंने दान, शील, तप व धर्म की विवेचना करते हुए कहा कि पुण्य, संवर, निर्जरा व मोक्ष को स्वीकार करें तथा पाप, आश्रव व बंध को छोड़े। पापकारी कार्यों से बचे। अपने भाव को शुद्ध रखे। भाव से केवल ज्ञान मिलता है।



























