बीकानेर के पुष्करणा समाज का सामूहिक विवाह (पुष्करणा ओलम्पिक) अपने आप में अभूतपूर्व है। सम्पूर्ण शहर परकोटे को एकछत घर समझकर कन्याओं के विवाह, बटुको के यज्ञोपवित हर मौहल्ले में धूमधाम से मनाये जाते है। इस सावे को देखने हेतु विदेशी व अन्य शहर से लोग आते है। आज यह सामूहिक कार्यक्रम अलग-अलग भवन, मंदिरों में करने का प्रचलन चल रहा है, जो चिन्ताजनक हैं। प्राचीन समय में सावे में हर गली में यज्ञोपवित धारण करने वाले बटुकों की बाहर आती थी।जोकि आज गायब हो गयी है। घरों में विवाहशगुन, गणेश के गीतों की स्वर लहरी निकलती थी। गणेश परिक्रमा में ओम ना सुसीसा, महिलाओं के द्वारा हर आयो हर आयो, लाडला डरपो मती रे, आदि लोक पारम्परिक गीतों की सस्वर ध्वनि इस प्रकार गूंजती थी मानों सामवेद का गायन हर चौराहे पर हो रहा है, बटुक के हाथ में पाटी घोटा , खडाऊ, कमण्डल वैदिक काल की याद दिलाता था। उस बटुक के दौड़ने पर सभी मौहल्लेवासी देखने के लिए उमड पडते थे। पकड़ो पकडों दौड़ गया आदि शब्दों का बाहुल्य होता था। आज यह रौनक गायब है। उपयुक्त समय पर उपनयन संस्कार पुष्करणा समाज का अभिन्न अंग रहा है। आजकल विवाह में भी मांगलिक गीतो का स्थान डीजे, बेन्ड वालो ने ले लिया है। जिस समाज का सावा ही शिव पार्वती के नाम पर निर्धारित होता हो जिसका सम्पादन वैदिक मंत्रों से होता हो ऐसी स्थिति में वैदिक व लोक परम्परा को त्यागकर आधुनिकता के जोश में मशगूल होकर केवल फिल्मी गानों की शरण लेना चिंताजनक है।आओ पुनः अपने पारम्परिक विवाह गीतो के स्वरो से विष्णु रूपी दुल्हे की बारात लेकर जाये।
अतः सभी से आशा करते है कि सावे की परम्परागत संस्कृति बनाये रखे यज्ञोपवीत , विवाह अपने-अपने घरों में करें। आर्थिक बोझ से बचने के लिए ही बीकानेर का यह पुष्करणा समाज सामूहिक विवाह-बीकानेर परकोटा छत पूरे भारत ही नहीं वरन विश्व में अपने आप में विशिष्टता लिये है। एक धामें में एक जान जीमे सभी को पगेलागणा पगेलागणा करे ।
















