
थोड़ी सी ग्लूटेन भी आंतों को नुकसान पहुंचाती है, इसलिए सख्त परहेज ही उपचार की कुंजी” : डॉ. श्याम अग्रवाल
बीकानेर पीडियाट्रिक्स सोसाइटी की सीलिएक रोग पर चिकित्सकीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन
बीकानेर पीडियाट्रिक्स सोसाइटी की ओर से गुरुवार को सदुलगंज स्थित होटल राज हवेली में आयोजित सीलिएक रोग विषयक चिकित्सकीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने इस बीमारी से जुड़े कई भ्रम दूर करते हुए आमजन और चिकित्सकों को जागरूक रहने का संदेश दिया। कार्यक्रम में संभागभर के 30 से अधिक वरिष्ठ एवं युवा शिशु रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया।
कार्यक्रम में शिशु रोग विभाग, सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज बीकानेर के विभागाध्यक्ष डॉ. जी.एस. तंवर ने कहा कि आज भी अधिकांश लोग सीलिएक रोग को केवल दस्त और कम वजन की बीमारी मानते हैं, जबकि यह कब्ज, मोटापा, बच्चों की लंबाई कम रह जाना, खून की कमी, किशोरावस्था में देरी, थायरॉइड विकार, मधुमेह, यकृत एवं गुर्दों से जुड़ी समस्याओं के साथ-साथ चिंता, अवसाद और मानसिक धुंधलापन जैसी परेशानियों के रूप में भी सामने आ सकता है।
उन्होंने बताया कि कई मरीज ग्लूटेन रहित भोजन लेने के बावजूद स्वस्थ नहीं हो पाते क्योंकि भोजन में अनजाने में ग्लूटेन मिल जाता है। एक ही आटा चक्की, तवा, टोस्टर, कढ़ाई, तेल या बर्तनों के उपयोग से भी भोजन दूषित हो सकता है। उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि खाद्य पदार्थों के लेबल अवश्य पढ़ें और केवल वही उत्पाद उपयोग करें जिनमें ग्लूटेन की मात्रा निर्धारित मानकों से कम हो।
डॉ. तंवर ने बताया कि डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ, सॉसेज, माल्ट, बेकरी उत्पाद तथा कुछ दवाइयों में भी छिपा हुआ ग्लूटेन हो सकता है। उन्होंने कहा कि “हर ‘ग्लूटेन रहित’ लिखा उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं है। जागरूकता और सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है।”
वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. श्याम अग्रवाल ने सीलिएक रोग के कारणों, जोखिम कारकों एवं उपचार को सरल भाषा में समझाते हुए कहा कि “थोड़ी सी ग्लूटेन भी आंतों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।” उन्होंने सभी चिकित्सकों से आह्वान किया कि वे कब्ज, मोटापा, बच्चों की कम लंबाई तथा बिना कारण खून की कमी वाले बच्चों में भी सीलिएक रोग की संभावना अवश्य जांचें।
उन्होंने कहा कि “सही पहचान, सख्त ग्लूटेन रहित भोजन और जीवनभर नियमित निगरानी ही सफल उपचार की कुंजी है।”
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. मोहित कुमार वोहरा ने रोग की जांच एवं भोजन संबंधी परामर्श पर विस्तार से जानकारी दी। वहीं डॉ. पी.सी. खत्री ने अपने चार दशक के अनुभव साझा करते हुए पुराने समय से लेकर वर्तमान उपचार पद्धतियों तक के बदलावों पर प्रकाश डाला।
डॉ. गौरव गोम्बर ने ग्लूटेन रहित भोजन शुरू होने के बाद मरीजों में होने वाले सुधार के अनुभव साझा किए, जबकि डॉ. महेश शर्मा ने सीलिएक रोग प्रबंधन में लाभकारी जीवाणुओं की संभावित भूमिका पर जानकारी दी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. रेणु अग्रवाल ने की तथा डॉ. पवन डारा का वैज्ञानिक मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। विशेषज्ञों ने कहा कि बदलती जीवनशैली और पैकेट बंद खाद्य पदार्थों के बढ़ते उपयोग के दौर में सीलिएक रोग की समय पर पहचान और सही खानपान ही बच्चों को गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है।














