“आज मैं बात करने जा रही हूं एक ऐसे विषय पर जो हम सभी के जीवन में एक इंसान, माता या पिता होने के नाते बहुत ही महत्व रखता है। यह विषय है”किशोरावस्था- एक चुनौती”। यह एक चुनौती है आपके लिए अगर आप एक किशोर हैं और इस से भी बड़ी चुनौती है अगर आप एक किशोर के माता या पिता हैं। यह एक चुनौती इसलिए है क्योंकि यह व्यक्ति के जीवन का ऐसा चरण है जिसमें शारीरिक के साथ- साथ अत्यधिक भावनात्मक ( मानसिक) बदलाव भी उसके जीवन में होते हैैं। यद्यपि जीवन एक निरंतर सीखते रहने, और सुधार करने की प्रक्रिया है परंतु बहुत हद तक व्यक्ति का आगे का जीवन उससे तय हो जाता है। यह तय हो जाता है कि वह किशोर कैसा वयस्क बनने वाला है या बनने वाली है।
हमारे लिए यहां यह जानना जरूरी है कि किशोरावस्था में कौनसे मानसिक/ भावनात्मक बदलाव व्यक्ति में होते हैं। ये निम्न प्रकार से हैं-
1. नवीनता की चाह और कुछ कर जाने का जज्बा।
2. भावावेश में निर्णय लेने की संभावना की अधिकता।
3. आवेगशीलता(impulsivity)
4. आत्मकेंद्रित बनना ( development of egocentricity)
5. जोखिम उठाने वाला व्यवहार ( Risk taking behavior) लेकिन उसके परिणामों के समझ की कमी।
6. नैतिकता यानी एक अच्छा इंसान बनने की चाह
7. नैतिक निर्णय क्षमता का विकास लेकिन भावनाएं ज्यादातर हावी रहती है।
8.माता पिता से वियोग। माता पिता से अंतरव्यक्तिक विरोध की संभावना जीवन की दूसरी अवस्थाओं की अपेक्षा किशोरावस्था में ज्यादा रहती है या कहें तो चरम पर होती है, खास तौर पर विशेषाधिकार, स्वतंत्रता और माता पिता द्वारा तय की गई सीमाओं को लेकर।
9. मित्रों का अत्यधिक प्रभाव।
किशोरावस्था एक चुनौती कैसे?
यह एक चुनौती इसलिए है क्योंकि अगर जीवन की इस अवस्था में व्यक्ति को सही वातावरण ना मिले, उचित साथ ना मिले या माता पिता के साथ विरोध ( conflict) जरूरत से बड़ा रूप ले ले तो उसका परिणाम ना सिर्फ वह किशोर भुगतता है बल्कि परिवार और राष्ट्र को भी उसके दुष्परिणामों को भुगतना पड़ता ही है।
दूसरी ओर अगर इस अवस्था को सही तरीके से सोच- विचार कर प्रबंधित किया जाए तो एक किशोर अथवा किशोरी एक जिम्मेदार व्यक्ति, माता, पिता, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन और नागरिक के रूप में उभर सकता है।
यह प्रबंधन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है यदि किशोर किसी लंबी बीमारी से ग्रसित हो।
क्या करें?
क्या करें?
1. सबसे पहले जरूरी है यह जानना और समझना कि किशोरावस्था में व्यक्ति के जीवन में शारीरिक और भावनात्मक बदलाव होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के इस पड़ाव से गुजरना होता ही है।
2. प्रत्येक माता पिता का कर्तव्य है कि किशोरावस्था के शुरूआत में ही धैर्य सहित बच्चे को यह समझाएं कि आने वाले कुछ साल उसके जीवन में अत्यधिक शारीरिक और मानसिक बदलाव वाले हैं और यह एक सामान्य बात है और वे हर स्तिथि में उसके साथी और सहयोगी हैं।
3. यहां मुझे चाणक्य की कही पंक्तियां बहुत ही प्रासंगिक लगती है-
“लाल्येत पंच वर्षानी, दश वर्षानी ताड़येत।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रम मित्रवदाचरेत।।”
अर्थात पांच वर्ष की आयु तक पुत्र से प्यार करना चाहिए; उसके बाद दस वर्ष तक उसकी ताड़ना की जा सकती है और उसे दंड दिया जा सकता है, परंतु सोलह वर्ष की आयु में पहुंचने पर उस से मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।
4. माता- पिता बच्चे से जुड़े हुए रहें। उसके प्रति आदेशात्मक रवैया अपनाने की बजाय, पारस्परिक आदर का व्यवहार रखें। उसकी सीमाएं तय करें लेकिन बातचीत के माध्यम से और वह भी सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में।
5. बच्चे से जुड़े रहने के साथ- साथ निगरानी और पर्यवेक्षण ( supervision ) भी अत्यधिक आवश्यक है।
6. माता – पिता को यह समझना चाहिए कि, पारिवारिक गतिविधियों में शामिल होने से बचना, निजता की चाह और तर्क – वितर्क इस उम्र के लिए सामान्य है और माता – पिता को चाहिए कि वे अपने व्यवहार में लचीलापन रखें, परंतु साथ ही अगर मनमुटाव या अलगाव अत्यधिक है तो यह किसी मानसिक रोग या लत की ओर इंगित कर सकता है। ऐसे में चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है।
7. अगर किशोर माता पिता के पास कोई ऐसा प्रस्ताव लाया है जो माता – पिता को उचित ना लगे तो बजाय कि उसके लिए सीधा ‘ ना ‘ कहा जाए, बेहतर है कि उसे उसके फायदे और नुकसान से अवगत कराएं और निर्णय उसे करने दें।
8. बच्चे को उस वक्त समझाएं जब वो भावनात्मक आवेग की स्तिथि में ना हो। ऐसे में बात से सहमति की संभावना ज्यादा रहेगी अन्यथा वार्तालाप एक बहस में बदल कर रह जाएगा।
9. आध्यात्मिकता का बीज जो कि बचपन में ही बोया जा सकता है ( या शायद गर्भ में ही) उसे अवश्य बोया जाए और उस धरती की उर्वरा शक्ति को ममता, देखभाल, सावधानी और धैर्य की खाद से बढ़ाया भी जाए।
10. माता – पिता अपने व्यवहार में इतना खुलापन रखें कि बच्चा उनसे कुछ भी कहने या बताने में संकोच ना करे।
तो क्या हम सभी तैयार हैं, एक किशोर को जिम्मेदार, मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति और नागरिक बनाने के लिए? तो आज ही अपनी कमर कस लीजिए इस शुभ कार्य के लिए- ” शुभम् शीघ्रम “।

अध्यक्ष, एडोलसेंट हेल्थ एकेडमी, बीकानेर














