“सहजन आधारित कृषि प्रणाली” विषय पर तीन दिवसीय कृषक कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ
प्रशिक्षण में बीकानेर जिले की विभिन्न तहसीलों के 30 किसान ले रहे हिस्सा
बीकानेर, 20 जुलाई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), क्षेत्रीय अनुसंधान स्टेशन, बीकानेर में नाबार्ड वित्त पोषित परियोजना के तहत “सहजन आधारित कृषि प्रणाली” विषय पर तीन दिवसीय कृषक कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को सहजन (मोरिंगा) आधारित आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली से जोड़कर उनकी आय, पोषण एवं रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना है।
कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर केंद्रीय मूंगफली अनुसंधान केंद्र, बीकानेर के प्रभारी अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र कुमार ने किसानों से सहजन आधारित कृषि प्रणाली अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि मोरिंगा एक बहुउपयोगी फसल है, जिसका उपयोग मानव पोषण, पशुपालन, कृषि तथा विभिन्न औद्योगिक कार्यों में किया जाता है। इससे किसानों की आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।
काजरी के अध्यक्ष डॉ. नवरत्न पंवार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में सहजन केवल एक फसल नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, पोषण सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने इसे भविष्य की टिकाऊ कृषि प्रणाली का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए अधिक से अधिक किसानों से प्रशिक्षण का लाभ उठाने की अपील की। उन्होंने जानकारी दी कि आगामी अगस्त माह में भी इस विषय पर दो और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
परियोजना के मुख्य समन्वयक डॉ. बी.एल. बिश्नोई ने बताया कि प्रशिक्षण में बीकानेर जिले की विभिन्न तहसीलों के लगभग 30 किसान भाग ले रहे हैं। साथ ही बताया कि सहजन के विभिन्न उत्पादों का मूल्य संवर्धन कर किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मोरिंगा औषधीय गुणों से भरपूर है तथा इसकी पत्तियां, फलियां और पाउडर दैनिक आहार में शामिल कर पोषण स्तर बेहतर बनाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण में भाग लेने वाले प्रत्येक किसान को प्रमाण-पत्र के साथ 1,000 सहजन पौधे निःशुल्क वितरित किए जाएंगे। परियोजना के तहत बीकानेर जिले के लगभग 300 किसानों को तीन लाख से अधिक पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे।
कार्यक्रम के संचालन एवं आयोजन में काजरी के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी डॉ. मनोज गोरा, श्री मूल सिंह गेहलोत एवं डॉ. सीताराम जाट का विशेष सहयोग रहा।












