परमात्म भक्ति में दास के भाव जरूरी-यति अमृत सुन्दरजी
बीकानेर, 03 अगस्त। रांगड़ी चौक के बड़ा उपासरा में गुरुवार को यतिश्री अमृत सुन्दरजी ने जैन धर्म के लोकप्रिय भगवान आदिनाथ के स्तुति वंदना के भक्तामर स्तोत्र के दो श्लोकों की व्याख्या करते हुए कहा कि परमात्मा भक्ति में दास भाव जरूरी है।
उन्होंने कहा कि प्रथम दादा गुरुदेव की स्तुति ’’इकतीसा’’ में सर्व प्रथम विनती में दास भाव से भक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। ’’दासानुदासा इव सर्व देवा, यदीय पादाब्जले लुठंति। मरुस्थली कल्पतरु-सजीयात युग प्रधानों श्री जिनदत्तसूरिः’’। परमात्मा की वाणी, संदेश, उपदेश का श्रवण करने, उन पर चिंतन-मनन करने, उसके अनुसार जीवन परिवर्तन का दृढ़ संकल्प करने वाला साधक को भक्ति प्राप्त करता है। परमात्म भक्ति करने वालों को सभी प्राणियों में समता भाव व स्नेह रखना होता है। अनन्य व सच्चे भाव से भक्ति में लीन साधक को परमात्मा के सद्गुण आने लग जाते हैं।
यति सुमति सुन्दर ने 18 पाप स्थानकों में वर्णन करते हुए कहा कि लोभ की प्रवृति को छोटे-छोटे नियमों की पालना कर समाप्त किया जा सकता है। संतोष व संतुष्टि जीवन में लोभ पर ब्रेक लगा सकती है तथा कम कर सकती है। लोभ कषाय शहद लगी तलवार की तरह होता है, जो जीवन विकास को काटता है। यतिनि समकित प्रभा ने कहा कि व्रजनाभी चक्रवर्ती राजा के माध्यम से कहा कि मनुष्य जीवन, देव, गुरु व धर्म के संदेशों का श्रवण, परमात्मा के प्रति श्रद्धा व उसके बाद पुरुषार्थ दुर्लभ है। साधना, आराधना व भक्ति के मार्ग में धीरज, धैर्य से आत्मा सिद्ध,बुद्ध व मुक्त बनती है।
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