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सभी आत्माओं का स्वभाव ज्ञान दर्शन-यतिश्री अमृत सुन्दरजी…


बीकानेर, 06 अगस्त। रांगड़ी चौक के बड़ा उपासरा में रविवार को यतिश्री अमृत सुन्दरजी ने अपने भक्तामर स्तोत्र की 13 व 14 वीं गाथा का वर्णन करते हुए कहा कि परमात्मा सभी उपमाओं से ऊपर है।
परमात्मा का आत्मिक दर्शन करने के बाद दूसरे को देखने की आवश्ययकता नहीं रहती। संसार में कभी दोष, दुख का कारण सांसारिक लोगों से प्रभावित होने से आते है। जो दूसरों से प्रभावित नहीं वाला, अपने आत्म व परमातम स्वरूप् में रमण करने वाला कभी दुखी नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि संसार की सभी आत्माओं का स्वभाव ज्ञान एवं दर्शन है। संसार के प्राणियों का ज्ञान दर्शन का स्वभाव उदय व नष्ट होने वाला भी होता रहता है। परमात्मा ज्ञान दर्शन का स्वभाव उदय ही रहता है परमात्मा निर्लिप्त रहते। बाहर की चीजों से सुख व शांति रहती है। हमारा शरीर तीन लोक इसमें प्राणों का संचार व चेतना परमात्मा देते। परमात्मा ही लोक के नाथों के नाथ है। परमात्मा, तीर्थंकरों साधना, आराधना, भक्ति व उपासना करने व उनकी आज्ञा में चलने से कोई संकट नहीं रहता।
यति सुमति सुन्दर ने 18 पाप स्थानक में 12 वें पाप क्लेश, कलह पाप का वर्णन करते हुए कहा कि संस्कार, सहनशीलता, क्षमा आदि गुणों के अभाव में व्यक्ति कलेश करते है। कलेश भीतर से प्रकटं। झगड़ा दोनों तरफ से होता है। झगड़े में प्रेम, आत्मीयता, मधुरता, वाणी का मिठास, अच्छे सद्गुण समाप्त हो जाते है। कलह के 11 पापों को एक साथ लेकर चल सकता है। भूलने वाली सारी बातें याद है इसलिए जिन्दगी में विवाद है। मन को सुधारने उसको जीतने वाला ही वहीं शूरवीर व महावीर होता है। यतिनि समकित प्रभा ने कहा कि महावीर के जन्म आदर्शों का स्मरण दिलाया।

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