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शुद्ध, चेतन आत्मा ही परमात्म स्वरूप की प्राप्ति संभव-यतिश्री अमृत सुन्दरजी…


बीकानेर, 08 अगस्त। रांगड़ी चौक के बड़ा उपासरा में मंगलवार को यतिश्री अमृत सुन्दरजी ने
भक्तामर स्तोत्र की 16 वीं गाथा का वर्णन करते हुए कहा कि परमात्मा बताएं मार्ग पर चलें तथा सत्य साधना, आराधना तथा भक्ति की जोत से जोत जलाते रहे। राग-द्वेष, आसक्ति और कर्म बंधनों से बचे ।
उन्होंने कहा कि मांगतुंगाचार्य ने भक्तामर स्तोत्र में परमात्मा आदिनाथ की परिकल्पना कभी चांद से, कभी मेरु पर्वत की परन्तु इस गाथा में आलौकिक प्रकाश देने वाले दीपक से की है। लौकिक दीपक में तो तेल, बाती चाहिए । लौकिक यानि संसारिक दीपक के धुएं से अंधकार,कालीमा, धुंधलापन, व्याकुलता व गर्मी होती है। ये सभी ज्ञानावर्णीय, दर्शनावर्णीय, मोहनीय व अंतराय कर्म के प्रतीक है। परमात्मा की आलौकिक ज्योति से ही यह जगत प्रकाशित होता है। परमात्मा के आलौक से आलौकित होने, कर्म बंधनों, आसक्ति से मुक्त रहने पर आत्मा का शुद्ध स्वरूप् प्रकट होता है। शुद्ध, चेतन आत्मा ही परमात्म स्वरूप् को प्राप्त करती है।

यति सुमति सुन्दर ने 18 पापों में चुगली, झूठा आरोप का वर्णन करते हुए कहा कि दूसरों की अच्छाई व गुण देखें, बुराई नहीं। उन्होंने विभिन्न कथाओं के माध्यम से बताया कि चुगली से कई बार निर्दोष लोगों शारीरिक, मानसिक व आर्थिक कष्ट होता है। चुगली करने वाला भी घोर पाप के कर्म बंधन बांधता है। उन्होंने एक भजन ’’’’मेरे हृदय आप बसों ए वीतराग भगवान है’ सुनाया। यतिनि समकित प्रभा ने शेर ’’मंजिल मिले ना मिले, ये किस्मत की बात, लेकिन कोशिश ही नहीं करें गलत बात है’’ सुनाते हुए कहा कि आत्म परमात्म प्राप्ति, कर्म बंधनों व आसक्ति से मुक्ति के लिए व्यक्ति को प्रयास करते रहना चाहिए।

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