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पर्युषण पर्व में देव, गुरु व धर्म की सत्य साधना, आराधना व भक्ति अधिक प्रभावी-श्रीपूज्यजी

बीकानेर, 13 अगस्त। जैनाचार्य श्रीपूज्य जिनचन्द्र सूरिश्वर के सान्निध्य में, यति अमृत सुन्दर, यति सुमति सुन्दर व आर्या मुक्ति प्रभाश्री, आर्या समकित प्रभा के नेतृत्व में रविवार को रांगड़ी चौक के बड़ा उपासरा में पर्युषण पर्व पर अष्टानिका प्रवचन शुरू हुए।ं बड़ी संख्या श्रावक-श्राविकाओं ने मौन रहते हुए, पांच सदाचारों का पालन करते हुए सत्य साधना की तथा श्रीपूज्यजी के नेतृत्व में चैत्य परिपाटी के तहत भगवान आदिनाथजी में दर्शन किए।
जैनाचार्यश्री पूज्यजी ने पर्युषण पर्व के पहले दिन तथा सत्य साधना के दूसरे दिन रांगड़ी चौक के बड़ा उपासरा में प्रवचन में कहा कि पर्युषण बुद्धि का खेल-खेलने, रीति, रिवाज का पर्व नहीं बल्कि अपने भीतर, झांकने तथा स्वयं को तराशने तथा आत्म स्वरूप् को जानने पर्व है। सत्य साधना के साथ पर्युषण पर्व में देव, गुरु व धर्म की साधना, आराधना व भक्ति अधिक प्रभावी रहती है।
उन्होंने कहा कि सत्य साधक अपनी साधना के दौरान मौन रखे तथा काया व शरीर को स्थिर रखे। व्यक्ति व सांसारिक वस्तुओं से मैं, मेरापन को हटाकर साधना करें। अपने श्वास के आने-जाने की प्रक्रिया को श्रद्धा व विश्वास के साथ अनुभव करें। दिमाग का खेल तो बहुत खेल लिया अब श्वास के चौकीदार बनें, उसके आवागमन पर पूर्ण नजर रखे। मंजिल की तरफ बढ़ने के लिए संयम,समता, क्षमा व मैत्री भाव के साथ एक-एक कदम चलें, आत्मा व परमात्म स्वरूप् की प्राप्ति की मंजिल नजदीक आएगी।
यति अमृत सुन्दरजी ने कहा कि पर्युषण पर्व के दिनों में जीवन को धर्म, आध्यात्म, जप, तप, साधना, आराधना व परमात्म भक्ति में लगाएं। अष्टानिका पर्व का व्याख्यान हमें तपस्या, सामयिक, पौषध, प्रतिक्रमण, ध्यान के माध्यम से कर्मों की निर्जरा करने, समता भाव में रहने, मन को शांत रखने,काम, क्रोध, लोभ व मोह आदि कषायों व पापों से बचने का संदेश देता है। कषायों के शस्त्र के प्रहार को धर्म-आध्यात्मिक विवेक, समता भाव व सजगता से नाकाम किया जा सकता है।
यति सुमति सुन्दरजी ने कहा कि मेहमान रूप् में आए पर्युषण पर्व के दिनों में भगवान महावीर के आदर्शों का स्मरण करते हुए अंतर भाव से स्वयं को देखे तथा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री व मंगलभावना रखे। आलस्य, प्रमाद का त्याग कर सत्य साधना, आराधना तथा परमात्म भक्ति के बिना एक क्षण भी व्यतीत नहीं हो। शरीर में व्याप्त पारसमणि रूपी आत्मा के स्वर्ण रूप स्वरूप् को प्रकट करें। अपने आपको जानो, सच को पहचानों तथा सच्चाई अपने भीतर देखें, बाहर की चीजों में भटके नहीं ।
यतिनि समकित प्रभा ने कहा कि पर्युषण पर्व के दौरान अपने अपने निज स्वभाव में आए तथा आत्म स्वरूप् को पहचाने तथा कर्म बंधनों को काटने का प्रयास व पुरुषार्थ करें। उन्होंने एक शेर ’जिन्दगी बड़ी हसीन है जो कभी हंसाती है, तो कभी रूलाती है, इस उठाव पटक में जो सदा खुश रहता है, जिन्दगी उसी के आगे सिर झुकाती है’’ व भगवान आदिनाथ सुनाते हुए सत्य साधना और परमात्म भक्ति को खुशी से करें।
सुगनजी महाराज का उपासरा
पर्युषण पर्व पर अष्टानिका प्रवचन
बीकानेर, 13 अगस्त। रांगड़ी चौक के सुगनजी महाराज उपासरे में पर्युषण पर्व पर आठ दिवसीय कार्यक्रम रविवार को शुरू हुए। जांवरा मध्यप्रदेश से आए स्वाध्यायी भाई मनीष कोचर ने अष्टानिका प्रवचन में पांच कर्तव्यों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि अहिंसा, साधार्मिक भक्ति, परस्पर क्षमापना, अट्ठम तप (तेला) व चैत्य परिपाटी में जिनालयों के दर्शन, वंदन व पूजन करें। पर्युषण पर्व के दौरान पांच कर्तव्यों का पालन नहीं करने वाले श्रावक-श्राविका को पाप व दोष लगता है। जीवन में सुख-दुख आने पर विचलित नहीं होते हुए धर्ममय रहते हुए अपनी आत्मा पर चढ़े कषायों को दूर करें। हमें आत्म चेतना का दीप जलाना है, काम,क्रोध, लोभ व मोह आदि कषायों की होली जलानी है । उन्हैल (उज्जैन) के स्वायायी भाई अरिहंत जैन व आदित्य जैन से उपासरे में स्थित भगवान अजीत नाथजी के मंदिर में स्नात्र महोत्सव के तहत पूजा करवाई।

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