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*मौंसूण परिवार के “भंवरसा” की स्मृतियां शेष पढ़ें कैसे थे भंवरसा*

आलेख- महावीर कुमार सहदेव

आज के इस वक्त में हर व्यक्ति अपने घर परिवार,गाड़ी,घोड़े बंगले आदि के बारे में विचार विमर्श करता ही रहता है और पता नहीं यह सब पाने के लिए आज का मनुष्य आज का व्यक्ति क्या-क्या करता है इसी भागम-भाग में अपना जीवन पूरा भी कर देता है लेकिन हम आपको एक ऐसे व्यक्ति की जानकारी आज लेख के माध्यम से बता रहे हैं कर रहे हैं देशनोक के पूर्व वाशिंदे स्वर्गीय फुसाराम जी मौंसुण जिनके पुत्र स्वर्गीय बाबूलाल जी मौंसूण जो की बीकानेर के बंगलानगर में काफी लंबे समय से निवास करते रहे हें। स्वर्गीय बाबूलाल जी के बड़े पुत्र भंवरसा जो की दिखने में बहुत ही भोलेभाले और साफ दिल के व्यक्ति थे। भंवरसा का हाल ही में 60 वर्ष की आयु में 30 मई 2024 को अकस्मात अपने निवास स्थान बंगलानगर पानी स्टैंड के पास में निधन हो गया। भंवरसा का छोटा सा जीवन परिचय हम आपको बताते हैं की भंवरसा अपने बाल्यकाल आयु से ही अपने पिता के साथ सोने चांदी का व्यवसाय करते रहे। भंवरसा की आयु जब 18 -20 बरस के लगभग हुई तो भंवरसा की शादी भी हो गई। भंवरसा अपने लंबे चौड़े परिवार के साथ रहते रहे। किसी कारणवश भंवरसा के पुत्र नहीं हो रहे थे और हुए तो वह चल बसे। भंवरसा ने बाबा रामदेव जी की कड़ी आराधना की, बाबा रामदेव जी की तरह दाढ़ी भी रखी, पैदल यात्रा की पुत्र प्राप्ति के लिए। बाबा रामदेव जी ने भंवरसा की विनती सुनी और भंवरसा के घर एक सुंदर सुशील गुणवान बच्चे का जन्म हुआ यह बच्चा आज जिसकी आयु लगभग 20 बरस के करीब है और नाम बाबा रामदेव जी के ऊपर उसका नाम भी रामदेव रखा। भंवरसा के चार भाई और दो बहने भी हैं कुछ चचेर भाई बहन भी हैं लेकिन भंवरसा इन सभी के बीच अपना और अपने परिवार का लालन-पालन करते रहे। भंवरसा ने कभी नहीं सोचा कि मैं अलग रहकर खाऊं कमाऊं अपना घर बनाऊं वै सिर्फ अपने परिवार के प्रति वफादारी से अपना कार्य पिता के कहे अनुसार हमेशा करते रहे। अपने परिवार में अपने से छोटों को भी काम करने की शिक्षा हमेशा देते रहते थे जबकि भंवरसा चेहरे से भोले लगते थे लेकिन इतना जरुर जानते थे कि घर में एकाकी प्रवृत्ति से किस प्रकार रहा जा सकता है। भंवरसा जो भी कमाते थे कभी वह अपनी कमाई का जिक्र नहीं करते थे और ना ही वह किसी को ताने बाने मारते थे पैसो को लेकर सिर्फ वह अपना परिवार एकमत से हुआ देखना पसंद करते थे और ऐसा चलता भी रहा। भंवरसा अपने आप में बेहद हंसी ठीठोली करने वाले और मजदूरी मैं विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। वह अपने आप को एक मजदूर ही समझते थे। उपरोक्त लाइनों में आपको बताया गया कि भंवरसा अपनी छोटी सी आयु में पिता के आगे वास्तविक जीवन में जैसे एक बालक रहता है वैसे ही पूरे जीवन रहे।जब भंवरसा 50 वर्ष के हो गए तब भी वह अपने पिता से अपनी जरूरत के हिसाब से 5 या 10 या रुपए मांग कर ले जाया करते थे यह भंवरसा की आदत और काम के प्रति खर्च के प्रति संयम था। भंवरसा ने कभी रुपए इकट्ठे अलग से नहीं किए हमेशा अपने माता-पिता और भाइयों के साथ रहे अंतिम समय भी वै अपने भाइयों के साथ रहे। भंवरसा के पिता भी आज से 4-5 वर्ष पहले चल बसे और माता श्री भी आज से 5-6 वर्ष पहले चल बसी। अब खास बात यह है कि भंवरसा अपनी मस्ती में मस्त रहने लग गए और भंवरसा का पुत्र अपने दादा दादि का बहुत अच्छी तरह से ख्याल रखता था जैसे कोई उनका पुत्र हो। भंवरसा की पत्नी भी भंवरसा के माता-पिता से भी पहले अकस्मात चल बसी। भंवरसा के पुत्र का लालन-पालन दादी और दादा ही करने लगे धीरे-धीरे भंवरसा का यह पुत्र 16 -17 वर्ष की आयु में पहुंच गया। भंवरसा के परिवार में माता-पिता पत्नी और भाई समेत कई प्राणी चल बसे। जो भाई भंवरसा के छोटे हैं उन भाइयों के साथ भंवरसा अपने पुत्र के साथ रहकर गुर्जर बसर करने लगे उनके साथ ही रहकर अपना गुजारा करते थे। आप सभी को जानकर बड़ा अचरज होगा कि लोग आज के समय में अच्छे घर अच्छी गाड़ी बंगला सोना चांदी आदि के बारे में विचार करते रहते हैं और भागम -भाग में भी रहते हैं लेकिन भंवरसा ने कभी ऐसा नहीं सोचा और घर परिवार के लिए हमेशा मर मिटने के लिए तैयार रहते थे। भंवरसा के ऊपर से पिता और माता का साया हटने के बाद अपने पुत्र को ही वह सब कुछ समझने लगे। वह अपने पुत्र को जब भी पुकारते तो “रामदे” नाम लेकर पुकारते थे। भंवरसा के दिलों दिमाग में एक ही बात थी कि यह पुत्र तो है लेकिन रामदेव का रूप है ।पता नहीं भंवरसा दिन भर में रामदेव का नाम कितनी बार “रामदे” “रामदे” लेकर पुकारा करते।भंवरसा के पुत्र की आयु आज 20 से 22 वर्ष होगी, बड़ा ही सुंदर सुशील और हर व्यक्ति के काम आने वाला यह युवा लड़का आज अपने पिता के मरणोपरांत की जो भी रसमें हैं वह निभाने का कार्य कर रहा है। भंवरसा बंगलानगर ही नहीं बीकानेर के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी हंसी-मजाक एवं बल के पीछे जाने जाते थे। भंवरसा अपने चाहने वालों के लिए दूर-दूर तक साइकिल पर चलकर मिलने के लिए पहुंच जाते थे। भंवरसा हमेशा ढीले कपड़े पहनने के शौकीन थे, सफेद कपड़े इनको बड़े ही अच्छे लगते थे और हमेशा पहनते भी थे।भाव भक्ति एवं मर्यादा में इतने कड़े व्यक्ति थे की एकादशी अमावस्या को किसी बहन बेटी के घर का दाना पानी भी नहीं खाते थे ।बहन बेटियों से कुछ लेना तो बहुत दूर की बात थी। यही गुण भंवरसा के पिता में भी थे,भंवरसा जब भी किसी शादी विवाह में पहुंचते तो वह अपने शरीर से जितना भी कार्य हो सकता था वह करते थे तब जाकर किसी के घर का खाना खाते थे। ईमानदारी भंवरसा में इतनी ठुंस ठुंस के भरी थी जिसका अंदाजा लगाना भी बड़ा मुश्किल है ,आज मरणोपरांत यह सब बातें सामने आ रही है। भंवरसा अधिकतर चांदी की पायले बनाने का कार्य करते थे जो बड़ी ही खूबसूरती से बनाते थे उनकी पायले बड़ी प्रसिद्ध थी।
*भंवरसा की जिंदगी के खास पहलू*
भंवरसा जब 55 वर्ष के हो गए तब भी वे अपने पिता के आगे बच्चों की तरह ही रहते थे और 1 रुपया भी जरूरत होता तो मांग के लिया करते थे ऐसे थे मौसूण परिवार के भंवरसा। जब पिताजी बाबूलाल जी का साया ऊपर से उठ गया तो वह सब कुछ अपने एकमात्र बेटे रामदेव से प्रेम और प्रीति मैं पड़ कर अपना जीवन यापन करने लग गए। भंवरसा का पुत्र रामदेव जब भी कभी बाहर जाता तो हमेशा अपने पिताजी को साथ ले जाना ही पड़ता था क्योंकि वै घर पर अकेले रहते नहीं थे ऐसी थी पिता और पुत्र की जुगलबंदी।
भंवरसा के स्वर्गवास होने के कुछ दिन पहले साइकोलॉजी में सिर्फ और सिर्फ एक मात्र पुत्र रामदेव ही था हालांकि भंवरसा के परिवार में कुछ और लोग भी थे लेकिन भंवरसा ने किसी पर भी विश्वास नहीं किया सिर्फ अपने पुत्र को ही सर्वे सर्वा माना क्योंकि पुत्र ही एक ऐसा था जो भंवरसा की हर एक बात को मान भी लेता था इसलिए बड़ा पुत्र में विश्वास था और एक बात यह भी थी कि भंवरसा के आराध्या बाबा रामदेव जी के कृपा से प्राप्त हुआ था।
भंवरसा ने अपने जीवन में प्राचीन भगवान की फिल्में खूब टीवी पर देखी। जब भी वह बाहर जाने का शौख रखते थे तो सिर्फ रामदेवरा पैदल जाने का ही शौक रखा और इस सोख के पीछे भी यही कहानी थी कि बाबा रामदेव जी भंवरसा के पुत्र प्राप्ति की इच्छा जो पूरी की थी। भंवरसा को पुरानी बातें सुनना बड़ा अच्छा लगता था, इन बातों के लिए वह दूर-दूर तक लोगों के पास जाया करते थे। घमंडी व्यक्ति से भंवरसा की कभी नहीं बनी, भंवरसा हमेशा ऐसे व्यक्तियों से दूरी बनाकर रखते थे चाहे वह घर का हो या बाहर का। *भंवरसा किसी को भी नहीं बकस्ते थे, कह देते थे मुंह पर बात*
भंवरसा अपनी सच्ची बातों के लिए भी प्रसिद्ध थे जब भी उनके सामने कोई बात चलती या कोई झूठ कपट करता, चतुराई करता, या घमंडी रवैया से रहता तो वह खुलकर मुंह के सामने ही सारी बात कह दिया करते थे कि भाई ‘यह तुझ में कमी है’।
60 वर्ष की आयु में जब भंवरसा का निधन हुआ उस वक्त से भंवरसा को चाहने वालों में बड़ी मायूसी है। जब भी बीकानेर में कई दशकों पहले समाज की न्याते हुआ करती थी उसमें भंवरसा को लगभग सभी लोग जानते थे। बीकानेर एवं बीकानेर के आस-पास के ग्रामीण क्षेत्र के लोग जो पुराने हैं वह सभी भंवरसा को अच्छी तरह से जानते हैं। जमाना कितना बदल गया लेकिन भंवरसा आखिरी समय तक वंही अपने पुराने अंदाज में रहे ,स्वाभिमनिता का जीवन जीते रहे। आज उनकी स्मृतियां अमर है और भंवरसा का पुत्र रामदेव जिसमें बहुत सी खूबियां भरी पड़ी है क्योंकि वह भंवरसा के द्वारा बाबा रामदेव जी से मांगा गया पुत्र है। भंवरसा का एकमात्र पुत्र रामदेव है जो अपने पिता के मरणोपरांत की रस्में करने में लगा हुआ है। भंवरसा का यह पुत्र रामदेव भी बड़ा अनोखा और सामाजिक व्यक्ति है पूरे परिवार में जब भी कहीं आवश्यक जाना होता है उस जगह सबसे पहले यह युवा पहुंचता है। इनके पास कुछ भी नहीं है फिर भी यह बहुत बड़ा दानदाता है, बहुत बड़ा करम योगी हैं, बहुत बड़ा सामाजिक व्यक्ति हैं, बहुत बड़े समाजसेवी भी है। भंवरसा में भी किसी प्रकार की गलत लत नहीं थी वैसे ही भंवरसा के इस नौजवान युवा में किसी भी प्रकार की कोई लत नहीं। बाबा रामदेव जी के द्वारा दिए इस भंवरसा के इस पुत्र में बिल्कुल स्पष्टवादीता , कर्मनिष्ठा, स्वाभिमनिता कूट-कूट कर भरी हुई है। जो भी बात करनी है वह स्पष्ट करता हैं और जब भी परिवार में कोई दुखी होता है तो यह युवा हमेशा सबसे पहले पहुंचता है।आज के इस समय में लोगों के किसी के तीन पुत्र हैं किसी के चार पुत्र हैं लेकिन अपना काम धंधा छोड़कर कोई किसी के काम नहीं आता और भंवरसा का एकमात्र पुत्र है जो हर वक्त अपने रिश्तेदारी में जहां पहुंचना होता है वहां पहुंचता है और अपना सेवा कार्य करता है। हमें आज इस बात की खुशी है की भंवरसा एवं भंवरसा के पिता स्वर्गीय बाबूलाल जी वह दादा स्वर्गीय फुसाराम जी तो इस संसार में नहीं रहे लेकिन उनके नियम उनके रहन-सहन उनकी भोली सी सूरत सभी आज इस युवा के चेहरे और दिलो दिमाग में स्मृतियों के रूप में है। समाज के हर तबके के लोगों को ऐसे व्यक्ति से प्रेरणा लेनी चाहिए कि वह भी अपने पिता के आगे एक बच्चे के समान रहे। ज्ञात रहे हम सत्य वृतांत के माध्यम से सब बातें हम मानगढ़त नहीं लिख रहे हमने जो देखा और काफी वर्षों से देखा वही हम आज लिख रहे हैं। मैं तो इस युवा को आज के समय में सर्वोपरि मानता हूं कि यह इतने बड़े परिवार को लेकर साथ चल रहा है और अपने दादा के, दादी के ,अपने चाचाओं के, अपनी भुवाओं के और भी बहुत रिश्तेदारों के सभी जगह यह युवा पहुंचता रहा अपनी सेवा देता रहा है ऐसा पुत्र भगवान सभी को दें। आज इस अनोखी कहानी में एक पिता और पुत्र का विच्छेद जरूर हुआ है और समय के अनुसार ऐसा होना भी होता है। अंत में दुख इस बात का है कि बहुत वर्षों साथ एक पिता और पुत्र रहे एक दूसरे को देखकर अपना जीवन यापन करते रहे और आज यह युवा बिन पिता के अकेला हो गया इस पुत्र रामदेव के ऊपर एकमात्र साया था अपने पिता का वह अब चला गया। प्रारब्ध का खेल बड़ा अनोखा होता है किसी न किसी रूप में भगवान ने किसी किसी का मेल ऐसा बिठाते हैं जो किसी को भी पता नहीं कोई पुत्र बनकर आ जाता है कोई पिता बनकर भगवान का यह खेल निराला ही है जैसे इनका पिता और पुत्र के रूप में बिठाया था। भगवान से प्रार्थना करता हुं कि सभी को रामदेव जैसा पुत्र दें और भगवान आज इस इकलौते रामदेव की सब इच्छाएं पूरी करें,इस पुत्र की अच्छे घर परिवार में शादी हो इसके भी पुत्र हो इसी कामना के साथ सत्य वृतांत अपने लेख को यहां विराम देता है आप सभी को राम-राम।

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दिलीप गुप्ता

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