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अरावली की गोद से रेगिस्तान के धोरों तक—कोटा के विद्यार्थियों ने किया बीकानेर का शैक्षणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अनुभव
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बीकानेर, 3 अगस्त 2025 (रविवार):

कोटा के कनवास कस्बे से निकले विद्यार्थी जब अरावली की शांत पहाड़ियों से राजस्थान के तपते रेतीले धोरों तक पहुँचे, तो उनके चेहरे पर रोमांच और सीख की चमक एकसाथ दिखाई दी। माँ दुर्गा कम्प्यूटर संस्थान एवं वेदांश स्टडी सेंटर कनवास द्वारा आयोजित पांच दिवसीय वार्षिक शैक्षणिक भ्रमण में छात्र-छात्राएं बीकानेर और आसपास के प्रमुख ऐतिहासिक, धार्मिक और भौगोलिक स्थलों से रूबरू हो रहे हैं।

शैक्षणिक यात्रा की शुरुआत:
1 अगस्त की सुबह 7 बजे कनवास से रवाना हुआ यह दल देवमाली, किशनगढ़ डंपिंग यार्ड, पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर, अजमेर का तारागढ़ किला, देशनोक स्थित करणी माता मंदिर, गजनेर पैलेस, लालगढ़ महल और जूनागढ़ किले का भ्रमण करते हुए बीकानेर पहुंचा।
हर पड़ाव विद्यार्थियों के लिए किताबों से बाहर निकलकर इतिहास और संस्कृति को महसूस करने जैसा रहा।

बीकानेर में अनुभवों की श्रृंखला:
बीकानेर आगमन के बाद रानी बाजार स्थित उद्योग मंडल में श्री अजीज भुट्टा द्वारा आयोजित फोटो प्रदर्शनी ने सभी को बीकानेर की शिल्प, परंपरा और विकास यात्रा से अवगत कराया। राजकीय गंगा संग्रहालय और जूनागढ़ किला भ्रमण के दौरान छात्र-छात्राओं ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और उनके महत्व को जाना।

रेतीले रोमांच और लोक-संस्कृति का संगम:
संध्याकाल में आयोजित घोड़ा फार्म और राष्ट्रीय पुष्प अनुसंधान केंद्र की यात्रा में विद्यार्थियों ने ऊँट और घोड़े की सफारी का रोमांच उठाया। कतरियासर के धोरों पर विद्यार्थियों ने बालू की रेत से खेलते हुए राजस्थानी मरुस्थल की आत्मा को महसूस किया। ऊँटनी के दूध से बने विशेष व्यंजनों ने इस अनुभव को और यादगार बना दिया।

धार्मिक स्थलों की अनुभूति:
वैष्णो धाम मंदिर (जयपुर रोड) जैसे आध्यात्मिक स्थलों के दर्शन कर विद्यार्थियों ने न केवल पर्यटन, बल्कि आस्था से जुड़ाव का अनुभव भी लिया।

समाज और सहयोग के प्रति आभार:
संस्थान की ओर से बीकानेर में आवास एवं स्वागत व्यवस्था हेतु मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज के पुखराज जी सोनी, राजेश कुमार सोनी, अशोक कुमार सोनी और कनवास मूल निवासी प्रो. आशुतोष सोनी के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया गया।

निदेशक का वक्तव्य:
संस्थान निदेशक श्री लाखन सिंह और श्री हरीश शर्मा ने बताया कि “पुस्तकों से बाहर निकलकर जब विद्यार्थी धरातल पर इतिहास, भूगोल और संस्कृति को देखते हैं, तब असली शिक्षा की शुरुआत होती है। यही इस भ्रमण का उद्देश्य है—ज्ञान के साथ अनुभव।”

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