




समस्त प्राणियों सुखी रखने के भाव रखे-गणिवर्य मेहुल प्रभ सागर म.सा.
बीकानेर, 23 अगस्त। गणिवर्य श्री मेहुल प्रभ सागर म.सा., मंथन प्रभ सागर, बाल मुनि मीत प्रभ सागर, साध्वीश्री दीपमाला, शंखनिधि के सान्निध्य में शुक्रवार को पर्युषण पर्व के तहत ’’कल्पसूत्र’ के प्रसंगानुसर परमात्मा महावीर के पालनाजी व मुनीम के पद का निर्धारण किया गया। चौविहार (बिना अन्न जल ) के 58 दिन की तपस्या पूर्ण करने वाले कन्हैयालाल भुगड़ी तथा अक्षय निधि व अन्य तपस्याएं करने वाले तप के तपस्वियों की अनुमोदना की गई।
सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट, अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद की बीकानेर इकाई की ओर से सकल श्रीसंघ के सहयोग से आयोजित चातुर्मास में शनिवार को गणिवर्य मेहुल प्रभ सागर म.सा ने कल्प सूत्र का वाचन विवेचन करते हुए भगवान महावीर के 27 भवों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जीवन की यात्रा में लक्ष्य व मार्ग की गति निर्धारित करने से प्रगति होती है। आत्म परमात्म प्राप्ति के लक्ष्य बिना मोक्ष नहीं मिलता । जीवन में जाति,कुल,सम्पति आदि का अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकारवश हंसते-हंसते पाप कर्म करने वालों को नारकीय पीड़ा व दुःख झेलना पड़ता है। पापाकारी प्रवृतियों व कार्यों से बचने व शुभ चिंतन, मनन व कार्य करने से शुभ आश्रव होता है। आत्मा पर चढ़े अहंकार,काम,क्रोध, लोभ व मोह आदि कर्मों के कचरे को दूर करने से आत्मा परमात्म स्वरूप में प्रकट होती है। समस्त प्राणियों के प्रति सुख की भावना व विचार रखने वाला स्वयं शांत व सुखी रहता है वहीं दूसरों के प्रति हिंसा, दुर्भावना,दुखी करने तथा पीड़ा पहुंचाने का भाव रखने वाला कभी सुखी व शांत नहीं रह सकता।
अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद की बीकानेर इकाई के अध्यक्ष अनिल सुराणा व सचिव विक्रम भुगड़ी ने बताया कि परमात्मा के पालनाजी का बाड़मेर के लाभ मूलचंद-भूरचंद सूरजमल भंसाली परिवार ने लिया वहीं मुनीम का पद वरिष्ठ कृष्णा लूणिया संभालेंगे। पर्युषण पर्व के दौरान नवांगी पूजा का दौरान लाचार, बीमार व वयोवृद्ध श्रावक-श्राविकाओं के निवास पर जाकर करवाया जा रहा है।
तपागच्छीय पौषधशाला-रांगड़ी चौक की तपागच्छीय पौषधशाला में जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की साध्वीश्री दीपमाला व शंखनिधि पर्युषण पर्व में अष्टानिका प्रवचन में कहा कि अट्ठम तप जैन धर्म में एक उपवास का प्रकार है जो पर्युषण पर्व के दौरान किया जाता है। आठ दिनों का यह उपवास आध्यात्मिक व धार्मिक तथा शारीरिक विकास के लिए अनुकरणीय है। इस तप का मुख्य उद्धेश्य आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्रकट करना तथा सांसारिक मोह माया से दूर होना है ।यह तप आध्यात्मिक नियंत्रण व अनुशासन और संयम का अभ्यास करवाता है।













