
बीकानेर, 15 सितम्बर। रांगड़ी चौक के श्री सुगनजी महाराज के उपासरे में चातुर्मासिक प्रवचन में सोमवार को गणिवर्य मेहुल प्रभ सागर म.सा. ने कहा कि मानव को अपने शरीर से परेशानी की बजाए अपने कर्मों से पीड़ा, तकलीफ व परेशानी होती है। जीवात्मा ने जो कर्म बांधे है उनको भोगना पड़ेगा। परमात्मा के स्मरण, दर्शन व वंदन करने से कर्मों को समता भाव से सहन करने की शक्ति मिलती है। समता के बिना दुःख, कष्ट व असताना के कारण नये कर्मों का बंधन होता है।
गणिवर्य ने कहा कि पुण्यानु बंधी पूण्य का उदय पापानुबंधी पुण्य की तुलना में बहुत ही उच्च कोटि की सामग्री देता है और आत्मा को संबल प्रदान करता है। पुण्यानु बंधी पूण्य से आत्मा अनति से दूर रहता है, बुद्धि निर्मल तथा भावनाएं पवित्र रहती है और व मोक्ष मार्ग की ओर उन्मुख होता है। मिली हुई सामग्री का उन्मार्ग की बजाय सन्मार्ग में व्यय होता है। पुण्यानु बंधी पूण्य का उदय होने अपने आप को तोलना है, अंतर में झांकना है। महापुरुषों के आदर्श को मानना है तथा उसके अनुसार चलना है। अपने आप से बात करनी है, पूछना है कि मै कौन हूं,कहां से आया हूं, कहां मुझे जाना है।
उन्होंने कहा कि सांसारिक विषय वस्तुओं व पारिवारिक रिश्ते व्यक्ति के स्वस्थ रहते, उससे स्वार्थ पूर्ति करने तक रहते है। स्वार्थ व जरूरत की पूर्ति होने पर उनसे लगाव व प्रेम समाप्त हो जाता है। हमें अंतर का कल्याण करना है। शुभ कर्म, सुख संयोग, अच्छी सामग्री मिलने पर, विपरीत परिस्थिति, दुख व कष्ट, असताना के समय कषायों बचना है, कर्म बंधनों को नहीं बांधना है।
गणिवर्य मेहुल प्रभ सागर, मुनि मंथन प्रभ सागर, बाल मुनि मीत प्रभ सागर, साध्वी श्री दीपमाला व शंख निधि के सान्निध्य में खरतरगच्छ युवा परिषद के राष्ट्रीय प्रचार प्रसार मंत्री, अकल कुआं, नंदूबार, महाराष्ट्र के शुभम जी भंसाली का अभिनंदन वरिष्ठ श्रावक फतेह चंद खजांची व हस्तीमल सेठी ने किया।













