विश्व की एक मात्र बीकानेर की पाटा संस्कृति का इतिहास 1488 में राव बीका द्वारा शहर की स्थापना से ही जुड़ा है, क्योंकि उनका राजसिंहासन भी पाटा के आकार का था। 18वीं सदी के दस्तावेजों में पाटा (चौकोर पत्थर की बेंचें) का उल्लेख मिलता है, और धीरे-धीरे पत्थर की जगह लकड़ी और धातु ने ले ली। यह संस्कृति शहर के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गई, जहाँ पाटे सामाजिक मेलजोल और बातचीत के केंद्र थे।
शुरुआत: पाटा संस्कृति की जड़ें राव बीका के समय से मानी जाती हैं, जब 1488 में शहर की स्थापना हुई और उनके सिंहासन का आकार भी पाटा जैसा था।
प्रारंभिक रूप: 18वीं सदी के अभिलेखों में बताया गया है कि पाटे पहले पत्थर के होते थे और लगभग हर इलाके में पाए जाते थे।
विकास: समय के साथ, पत्थर की जगह लकड़ी और धातु के बने पाटे लोकप्रिय हो गए।
महत्व: पाटे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए, जो परिवार के स्वामित्व वाले और सार्वजनिक उपयोग दोनों के लिए थे। लोग इन पर बैठकर सुख-दुख बांटते थे और सामूहिक चर्चाएं करते थे। ऐसी संस्कृति जहां पर बड़े बुजुर्ग बच्चे सब एक साथ बैठते हैं जहां पर लोक कला संस्कृति का पुनः शरण होता है जिसे हम अपनी भाषा में पाटा संस्कृति यह एक ऐसी लोक संस्कृति है जहां पूरा शहर दिन भर अपनी व्यस्तता को भूलकर जहां दिन भर की थकान दूर करते हैं यह एक ऐसी संस्कृति है जिसे पूरे विश्व भर में विख्यात है समय-समय पर होने वाली आयोजनों का आगाज होना यह भी पाटा संस्कृति का हिस्सा है पाटा संस्कृति मूलतः पश्चिम राजस्थान के बीकानेर मैं पाई जाती है हम बीकानेरी अपने दिन भर के सारे कामों में व्यस्त रहते हैं उसके बाद शाम ढलने तक उसे पल का इंतजार करते हैं कब शाम होगी और कब पाटो पर बैठेंगे बीकानेर की आबो हवा में बसा है पाटा संस्कृति यहां दिन भर काम में व्यस्त रहने के बाद सकून महसूस होता है विवाह समारोह के मौके पर मोहल्ले में अगर कोई मेरा उठना भी हो तो इन्हीं पाटो पर से उठना होता है यह बीकानेर की पाटा संस्कृति सभी परिवारों का एक जरूरी हिस्सा बन गई है विचारक शिव पुष्करणा लाल जी (बीकमपुरिया) बीकानेर लाइव न्यूज़ रिपोर्टर दाऊ लाल कल्ला




























