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भगवान पारस जन्म कल्याणक दिवस मनाया, उवसगहर पाठ का 27 बार हुआ पाठ, जप-तप के हुए आयोजन

भगवान पाश्र्वनाथ की स्तुति व स्मरण मात्र से दूर हो जाते हैं संकट : साध्वी जिनबालाजी
बीकानेर। आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वीश्री जिनबालाजी के सान्निध्य में तेरापंथ सभा भवन भीनासर के प्रांगण में भगवान पारस जन्म कल्याणक दिवस के उपलक्ष्य में उवसगहर स्त्रोत का विशेष जप अनुष्ठान आयोजित किया गया। जिसमे 108 बीज मंत्र के साथ 27 बार उवसगहर पाठ का उच्चारण किया गया।  साध्वीश्री जिनबाला जी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि भगवान् पार्श्व प्रभु जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा जैन मन्दिर पार्श्व प्रभु के ही है और सबसे ज्यादा पूजा भी भगवान् पार्श्व नाथ की ही होती है। इस एक कारण यह है कि उनके आदेय शुभ नाम कर्म का उदय था। दूसरा कारण यह था कि उसके पार्श्व नाम का एक अधिष्ठायक यक्ष था। यह यक्ष पार्श्व प्रभु का जप स्तवन आदि करने वालों की सहायता करता था। एक कारण यह भी है कि पार्श्वनाथ के तीन श्रावक थे। वे तीनों देवलोक में सूर्यदेव, चंद्रदेव, शुक्रदेव बने। ये देव विशेष रिद्धिकारी होते हंै। भगवान् पार्श्वनाथ स्तुति व स्मरण करने वालों की सहायता करते हैं तथा उनके कष्टों को दूर करते हैं। साध्वी श्री ने कहा कि जैन धर्म में उवसगहर स्तोत्र भी बहुत चमत्कारी है। कहते हैं कि जैन संघ ने प्रतिदिन आने वाले कष्टों से त्राण पाने के लिए आचार्य भद्रबाहु स्वामी से प्रार्थना की। करुणा सागर श्रुत के बलि भद्रबाहु स्वामी ने उनकी प्रार्थना पर ध्यान देकर संघ सुरक्षा हेतु आने वाले बाहरी विक्षेप को समाप्त करने के लिए महावीर निर्वाण के 170 वर्षों के बाद प्राकृत भाषा में महाप्रभावक उवसगहर स्तोत्र की रचना की। पंच पद्यात्मक इस स्तोत्र में 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की स्तुति की गई है। साध्वी वृंद ने पार्श्व प्रभु की स्तुति में सामूहिक गीतिका की प्रस्तुति दी। आज के अवसर पर अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास, बेला, तेला, एकासन आदि तप भी किये।

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Gordhan Soni

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