

बिस्सों के चौक में भक्त पूरणमल की रम्मत आज रात को
तैयारियां परवान पर
बीकानेर, 25 फरवरी। बिस्सों के चौक में देवी आशापुरा नाट्य एवं कला ंसस्थान की ओर से उस्ताद रमणसा बिस्सा की ’’भक्त पूर्णमल’’ की रम्मत (लोकनाट्य) गुरुवार रात करीब बारह बजे शुरू होकर शुक्रवार सुबह साढ़े नौ बजे तक चलेगीं । रम्मत की तैयारियां परवान पर है चौक में रंग बिरंगी, रोशनी, बैनर आदि से सजावट की गई। लोकनाट्य का पूर्वाभ्यास में सभी पात्रों ने पद्य के संवादों को बखूबी विशेष अंदाज व आवाज में प्रस्तुत किया।
रम्मत के उस्ताद कृष्ण कुमार बिस्सा ने बताया कि रम्मत में कामदेव व ब्रह्मचर्य के प्रभाव, नारी के चरित्र, वृद्धावस्था के बावजूद लोगों में काम की लालसा पर विभिन्न राग व तर्जों के संवादों के माध्यम से कटाक्ष किया गया। दुखान्तिका का यह लोक नाट्य देव, संत-महात्माओं की कृपा से, सतीव्रता नारी के तप से सुखान्तिका मे ं बदल जाता है।
कथानक-बिस्सा ने बताया हाथरस के मुरलीधर व नत्थाराम द्वारा लिखित इस लोकनाट्य में पंजाब के सियालकोट के वृद्ध राजा शंख पति , उत्तर प्रदेश के कुशम नगर में स्वयंवर में मछली का भेदन कर नवयुवती फूलन दे को विवाह कर ले जाते है। नव विवाहित युवती फूलन दे राजा शंखपति के पुत्र भक्त पूर्णमल पर आसक्त हो जाती है। वह बहाना बनाकर अपने महल में बुलवा लेती है तथा अपनी काम पिपाशा शांत करना चाहती है, लेकिन भक्त पूर्णमल के अनुनय विनय करता है ’’ तू माता में पुत्र हूं, सोच समझे मन माही, चढू पिता के सहज पर, पलट जमाने जाए’’ । नव विवाहिता फूलन दे उसके बाद भी जवानी के वासना से वशीभूत होकर पारिवारिक, सामाजिक रिश्तों को दर किनार कर भक्त पूर्णमल के साथ जोर जबरदस्ती कर उसकी कटार व फैंटा अपने पास रख लेती है तथा राजा शंखपति को बुलाकर भक्त पूर्णमल द्वारा जोर-जबरदस्ती की झूठी मनगढ़त कहानी बताकर उसे फांसी पर चढ़वा देती है। भक्त पूर्णमल की पार्थिव देह को लेकर उसकी माता अम्बादे जंगल में विलाप करती है, इसी दौरान गुरु गोरखनाथ व उनका शिष्य ओघड़ नाथ भक्त पूर्णमल को जिन्दा कर दते है। भक्त पूर्णमल सन्यासी बनकर परमात्म भक्ति करते है।
रम्मत का आगाज-रम्मत का आगाज पुष्करणा समाज के बिस्सा जाति की कुलदेवी देवी आशापुरा के मंच के अवतरण से तथा उनकी देवळी में पूजा अर्चना व स्तुति से होती है। छोटा बालक आशापुरा देवी का स्वरूप धारण करता है । उस वक्त पूरा चौक आशापुरा के जयकारों तथा ’’ करो आशापुरा आनंद शहर बीकाणे में ’’ भक्ति गीत से गूंज उठता है। इसके बाद देवी अम्बिका व पंथवारी माता की स्तुति वंदना ’’अम्बिके, जय शिव प्यारी अम्बिके, मात हमारी अम्बिके। भगवान गणेश का स्मरण करते हुए टेर (रम्मत के संवाद ) सुनाते हुए स्तुति वंदना की जाती है। उसमंें बिस्सा पुष्करणा ब्राह्मण परिवार के तपस्वी, वेदपाठी व तांत्रिक स्वर्गीय जागनाथ बिस्सा, उनके शिष्य हीरालाल व्यास रताणी, जीतमल सेवग व उस्ताद रमणसा बिस्सा आदि का स्मरण वंदन किया जाता है। महादेव की स्तुति ’’गागड़ दी गंग सोहे, शीश पे, पागड़दी पार्वतों के साथ, सांगड़ दी शिव शंकर नाम तो भागड़दी भंग पीवे नाथ’’’ भक्ति रचना से की जाती है।
जोशी-जोशण व खाखी की भूमिका-देवी-देवताओं व रम्मत के उस्तादों के बाद जोशी जोशण तथा खाखी के पात्र भी दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र रहते है। ’’जोशी-जोशण के पात्र अच्छे जमाने का संदेश देते है वहीं खाखी रम्मत के अखाड़े व कलाकारों को बुरी बलाओं व बुरी नजर से बचाने के लिए धूम करते है।
कौन थे जागनाथजी व रमणा बिस्सा –
जागनाथजी बिस्सा देश की आजादी से पूर्व बीकानेर व वर्तमान पाकिस्तान के करांची में कार्य व्यापार करते थे। उनको करांची में किसी कारण वंश जेल में बद कर दिया । जेल में उन्होंने अपने तंत्र विद्या व साधना से जेलर के बेटे का सांप का जहर उतार कर उसे जीवन दान दिया। तब उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। वर्तमान में करांची में स्वर्गीय जागनाथ बिस्सा की छतरी व उनके नाम से तालाब व शिलालेख मौजूद है। रमणसा बिस्सा बीकानेर के राय बहादुर डागा परिवार के मुनीम थे तथा लोकनाट्य रम्मत के प्रश्रयदाता, संवाद लेखक थे पहलवानी, कुश्ती, शारीरिक व्यायाम में माहिर रमणा ने 16 वर्ष की आयु में जस्सूसर गेट के अंदर बजरंग व्यायामशाला की स्थापना की। बजरंग व्यामशाला में सैकड़ों लोगों ने व्यायाम व कुश्ती का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उनके 1985 के निधन बाद भी बजरंग व्यायामशाला तथा रम्मत का संचालन व परिजन कुशलता से कर रहे है।
पहले स्वांग मेहरी की रम्मत- बिस्सांें के चौक में पहले स्वांग मेहरी की रम्मत होती थी, उसमें ख्याल चौमासा की रचना में स्वर्गीय रमणसा बिस्सा का योगदान रहता था। बाद में यहां नौटंकी शहजादी की रम्मत शुरू की गई। इसमें स्वर्गीय आशाराम जागा, स्वर्गीय जीतामल सेवग, हनुमान माली, सिराजूदीन विभिन्न पात्रों की पात्रता निभाते थे तथा दमामी घमजी के नगाड़ा वादन सबको आकर्षित किये बिना रही रहता था। करीब तीन चार शताब्दी प्राचीन रम्मत की परम्परा को पिछले पचास वर्षों से स्वर्गीय रमणा बिस्सा परिवार के कृष्ण कुमार बिस्सा, राम कुमार बिस्सा सहेजे संभाले हुए है। अधिकतर मुख्य पात्र रमणसा बिस्सा परिवार के सदस्य निभा रहे है। रम्मत में बिस्सों के चौक में रहने वाले रंगा, व्यास, पुरोहित, कल्ला, जोशी पुष्करणा ब्राह्मण परिवार के साथ माहेश्वरी डागा परिवारों का भी परोक्ष अपरोक्ष रूप से सहयोग रहा है। एक बार उतर प्रदेश की मंडली ने बिस्सों के चौक में नौटंकी शहजादी लोकनाट्य की प्रस्तुति दी। उन कलाकारों से प्रभावित होकर स्वर्गीय रमणसा बिस्सा व उनके पूर्वजों ने नौटंकी शहजादी रम्मत प्रतिवर्ष करवाना निश्चय किया। बाद में करीब पचास वर्षों से वर्तमान उस्ताद कृष्ण कुमार बिस्सा एक वर्ष नौटंकी शहजादी व एक वर्ष भक्त पूरणमल की रम्मत की परम्परा की शुरुआत की है।
रम्मत का संगीत पक्ष-
सुप्रसिद्ध लोकगायक व संगीतकार सांवर लाल रंगा ने बताया कि बिस्सों के चौक में रम्मत का संगीत व नृत्य पक्ष अपने आप में प्रभावी है। रम्मत में पात्र का किरदार निभा चुके अनेक बार संवादों को प्रभावी अदायगी करने वाले रंगा ने बताया कि लोक नाट्य में दोहे, चौबोले, लावणी के साथ विभिन्न रागों यथा दादरा, कहरवा, टोड़ी बहरत, तबीली, माड में संगीतमय संवाद आदयगी होती है। भक्त पूर्णमल की रम्मत में राग टोड़ी बहरत में श्रेष्ठ नारी का संदेश दिया है ’’सुनले पतिव्रता के सुमार, उतम, मध्यम, लघु अधम चार होती है। उतम पतिव्रता वही है, जिसने कभी ख्वाब में पर पुरुष न देखा है’’। लोक नाट्य में संवादों के साथ लोकगीतों व नृत्यों का भी आनंद लोग ’’ क्या बात है’’ क्या कै वणों है’’ शब्दों से कलाकारों का हौसला अफजाई करते है। रम्मत में पूर्व वर्षों में नारी का स्वरूप धारण कर नृत्य करने वाले जैसलमेर के हरीश सोनी, बीकानेर के स्वर्गीय तेजवीर गिरि व गौरी शंकर सेन के नृत्य दर्शक आज भी याद करते हैं।
रम्मत का समापन- करीब आठ साठे आठ बजे तक चलने वाली रम्मत का समापन माता की स्तुति के बाद होता है। सभी कलाकार देवी आशापुरा की देवळी में नतमस्तक होकर उनसे प्रार्थना करते है कि अगले वर्ष इसी तरह सुख, सम्पति व समृद्धि व उतम स्वास्थ्य के साथ अखाड़े में रम्मत करने की कृपा करना ।
रम्मत के पात्र-विशाल पुरोहित-देवी आशापुरा स्वरूप, कवि व सूत्रधार तथा हारमोनियम वादन-इंद्र कुमार बिस्सा, रानी अम्बादे-विकास पुरोहित, शंखपति-गोविंद गोपाल बिस्सा’, नव विवाहिता रानी फूलन दे-मनोज कुमार व्यास, बांदी-विष्णु दत बिस्सा, भक्त पूर्णमल कृष्ण कुमार बिस्सा, गुरु गोरखनाथ-महेन्द्र बिस्सा, औद्यड़नाथ का किरदार प्रेम गहलोत निभाएंगे। नगाड़े पर मनीष व्यास, संगत करेंगे। सह गायक रामकुमार बिस्साख् बल्लूजी बिस्सा, अविनाष, अनिकेत, रविन्द्र, देवेष, लूणाराम, विजय कुमार व्यास, डी.के.कल्ला, कमल कल्ला, पंडित योगेष बिस्सा, विष्णु बिस्सा, रुद्र पुरोहित, शिवम पुरोहित व भैरव रतन बिस्सा होंगे। जो संवादों की टेर भरेंगे। टेर बिना रम्मत ढेर हो जाती है इसलिए टेर भरने वाले कलाकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
आलेख-शिव कुमार सोनी, वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार 25.2.26


























