
बीकानेर, 22 सितम्बर। बीकानेर से 24 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक व हजारों सर्व जाति-समुदाय के श्रद्धालुओं के आस्था व विश्वास के प्रमुख केन्द्र कोडमदेसर में भैरवजी का सालाना मेला 23 (बुधवार) व गुरुवार 24 सितम्बर को भरेगा। अनेक श्रद्धालु पैदल, विभिन्न वाहनों से 23 सितम्बर को सुबह रवाना होकर कोडमदेसर गांव पहुंचेंगे तथा बुधवार रात को कोडमदेसर में ठहर कर भैरवजी की स्तुति वंदना व भक्ति करेंगे।
श्री देदारामजी गहलोत (माली) वंशज सार्वजनिक प्रन्यास के पदाधिकारियों, व देदारामजी वंशज गहलोत पुजारी परिवार के गणमान्य सदस्यों की सभा में मेले की तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल, भीड़ नियंत्रण, सुगमता से दर्शन व पूजन, के साथ आकर्षक रोशनी व सजावट की गई है।
श्री देदारामजी प्रन्यास के अध्यक्ष विजय गहलोत ने बताया कि भादवा सुदी द्वादशी बुधवार को भैरवजी का पूजन, विशेष श्रृंगार, भोग व महा आरती के साथ विधि विधान से मेले की शुरुआत होगी। मेला स्थल पर खान पान की वस्तुओं, खिलौनों व प्रसाद आदि की दुकानें लगनी शुरू हो गई। बीकानेर शहर व आस पास के गांवों के श्रद्धालु बुधवार सुबह ही पैदल व विभिन्न वाहनों में भैरव नाथ का जयकारा लगाते हुए कोडमदेसर भैरव मंदिर में दर्शन वंदन करने के लिए पहुंचने शुरू हो जाएंगे। मंदिर में मेले के दौरान आकर्षक सजावट की गई है।
प्रन्यास की ओर से जिला व पुलिस प्रशासन को एक ज्ञापन देकर मेले के दौरान चोरी, अप्रिय घटनाओं को रोकने, मंदिर के आगे ठेलों आदि के अस्थाई अतिक्रमण हटाने, यातायात को सुव्यवस्थित करने के लिए माकूल व्यवस्था करने की मांग की है।
पैदल यात्रियों के लिए सेवा शिविर- बीकानेर की चूंगी चौकी से लेकर कोडमदेसर गांव तक अनेक सामाजिक एवं स्वयं सेवी संगठनों की ओर से सेवा शिविर लगाएं जाएंगे। सेवा शिविरों में चाय, नाश्ता, पेयजल, पकौड़ी, फल, व आइसक्रीम आदि की सेवा की जाएगी। मंगलवार को ही अनेक सेवा संगठनों ने टैंट तनवा लिए।
मंदिर का इतिहास
बीकानेर स्थापना से पूर्व के इस मंदिर की स्थापना सन् 1465 के आस पास जब राव बीकाजी ने जोधपुर को छोड़कर बीकानेर की तरफ आए तो उनका शुरूआती पड़ाव यह क्षेत्र रहा है। कोडमदेसर नाम राव जोधा की पुत्री और राव बीका की बहिन राजकुमारी कोडमदे के नाम पर पड़ा । मंदिर के ठीक पीछे एक बड़ा तालाब है। जिसमें 1459 ईस्वी के साथ ऐतिहासिक तथ्य अंकित है। हाल ही स्वयं सेवी संगठनों ने प्रन्यास के सहयोग से तालाब का जीर्णोंद्धार करवाया था। गोरे भैरवजी की प्रतिमा मंडोर से लाकर यहां स्थापित की गई थी।
भैरवजी की मूर्ति खुले आसमान के नीचे स्थापित है, इस मंदिर पर कोई छत नहीं है। कोडमदेसर भैरवजी को बीकानेर नगर ही नहीं छतीस जाति समुदाय के लोग अपने रक्षक व आराध्य देव मानते है। श्री देदारामजी गहलोत (माली) के पूर्वजों ने भैरवजी की मूर्ति को लाकर यहां स्थापित किया,इसलिए आज भी बीकानेर व सुजानदेसर के गहलोत परिवार भैरवजी के पुजारी व भोपा के रूप में अपनी बारी के अनुसार सेवा पूजा करते है। बीकानेर रियासत के पूर्व महाराजा गंगासिंहजी ने इटली के संगमरमर से मंदिर का जीर्णोंद्धार करवाया। मेले के दौरान राजपरिवार की ओर से छत्र, भेट आदि चढ़ाने की परम्परा रही है।











