चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार, और टीमवर्क को बनाया प्रशासनिक मजबूती
बीकानेर।
किसी बड़े चिकित्सा संस्थान का नेतृत्व केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं होता। यहां हर निर्णय सीधे मेडिकल विद्यार्थियों, चिकित्सकों, कार्मिकों और सबसे महत्वपूर्ण हजारों मरीजों से जुड़ा होता है। ऐसे में सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज, बीकानेर के प्राचार्य एवं नियंत्रक के रूप में डॉ. सुरेंद्र कुमार वर्मा का पहला वर्ष प्रशासनिक जिम्मेदारी, चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार, अकादमिक गतिविधियों और विभिन्न स्तरों पर समन्वय का वर्ष बनकर सामने आया है।
राज्य सरकार ने 8 अक्टूबर 2025 को जनरल मेडिसिन के वरिष्ठ आचार्य डॉ. सुरेंद्र कुमार वर्मा को सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज का प्राचार्य एवं नियंत्रक नियुक्त किया था और उन्होंने 9 अक्टूबर को पदभार ग्रहण किया। पदभार संभालते समय ही उन्होंने कॉलेज को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने तथा शोध, शिक्षा और रोगी सेवा को प्राथमिकता देने की बात कही थी।
एक वर्ष बाद उनके प्रशासनिक सफर को देखें तो इसकी सबसे स्पष्ट विशेषता केवल नई योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि कॉलेज, पीबीएम समूह के अस्पतालों, विभागाध्यक्षों, चिकित्सा शिक्षकों, रेजिडेंट्स और विभिन्न संस्थाओं को एक साथ जोड़कर व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश रही है।
*राजएपिकॉन-2025: बीकानेर की अकादमिक क्षमता का बड़ा प्रदर्शन*
डॉ. वर्मा के कार्यकाल के शुरुआती महीनों में ही बीकानेर ने चिकित्सा जगत के एक प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय आयोजन की मेजबानी की। 20 और 21 दिसंबर 2025 को एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया की राजस्थान शाखा की 37वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस ‘RAJAPICON-2025’ बीकानेर में आयोजित हुई।
इस सम्मेलन का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि आधिकारिक कॉन्फ्रेंस ब्रोशर में डॉ. सुरेंद्र कुमार को आयोजन सचिव के रूप में जिम्मेदारी दी गई थी। वैज्ञानिक कार्यक्रम में विभिन्न विशेषज्ञ व्याख्यानों, शोध-पत्रों, पोस्टर प्रस्तुतियों, पैनल चर्चाओं और चिकित्सकीय विषयों पर संवाद को शामिल किया गया। यानी उनके लिए यह केवल प्राचार्य के रूप में औपचारिक उपस्थिति वाला आयोजन नहीं, बल्कि सीधे प्रबंधन और समन्वय से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी थी।
राजएपिकॉन जैसे बड़े सम्मेलन का सफल आयोजन एसपी मेडिकल कॉलेज की अकादमिक क्षमता के साथ उस प्रशासनिक समन्वय को भी रेखांकित करता है, जिसमें फैकल्टी, आयोजन समिति, विशेषज्ञ चिकित्सकों और बाहर से आने वाले प्रतिनिधियों के बीच व्यवस्था बनाना आवश्यक होता है।
यह आयोजन उस लक्ष्य से भी जुड़ता दिखाई देता है, जिसे डॉ. वर्मा ने पदभार संभालते समय व्यक्त किया था—कॉलेज की शैक्षणिक और शोध आधारित पहचान को राजस्थान से आगे ले जाना।
*मूंधड़ा मेडिसिन विंग: स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव*
उनके कार्यकाल में पीबीएम अस्पताल की चिकित्सा क्षमता बढ़ाने से जुड़ा एक बड़ा घटनाक्रम सी.एम. मूंधड़ा मेडिसिन विंग को लेकर भी सामने आया।
दिसंबर 2025 में राज्य सरकार और श्रीमती सी.एम. मूंधड़ा मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के बीच इस मेडिसिन विंग के संचालन को आगे बढ़ाने के लिए एमओयू हुआ। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इस विंग पर 100 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आई है और इसमें 500 से अधिक बेड की क्षमता विकसित की गई है। एमओयू की प्रक्रिया के दौरान प्राचार्य डॉ. सुरेंद्र कुमार वर्मा भी चिकित्सा संस्थान की ओर से उपस्थित रहे।
यह परियोजना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पीबीएम पर बीकानेर शहर ही नहीं, पूरे संभाग और पश्चिमी राजस्थान के अनेक क्षेत्रों के मरीजों का दबाव रहता है। ऐसे में अतिरिक्त मेडिसिन बेड, आईसीयू, आइसोलेशन वार्ड, चिकित्सक कक्ष और अन्य सुविधाओं का जुड़ना मरीजों के लिए बड़ी राहत की दिशा में कदम है।
*71 लाख के आधुनिक जांच उपकरण, मरीजों को एक ही परिसर में सुविधा*
सितंबर 2026 में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को एक और मजबूती मिली। भारतीय स्टेट बैंक ने सीएसआर के तहत मूंधड़ा मेडिसिन विंग को लगभग 71 लाख रुपये के अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध करवाए। इनमें अल्ट्रासोनोग्राफी मशीन, डिजिटल एक्स-रे और पोर्टेबल एक्स-रे मशीन शामिल थीं।
डॉ. वर्मा ने इस अवसर पर कहा कि इन सुविधाओं से मरीजों की जांच और उपचार व्यवस्था बेहतर होगी तथा जांच के लिए मरीजों को अन्य विभागों तक ले जाने की आवश्यकता कम होगी।
यह पहल डॉ. वर्मा की उस प्रशासनिक शैली को भी दर्शाती है जिसमें सरकारी संसाधनों के साथ सामाजिक संस्थाओं, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और भामाशाह सहयोग को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने पर जोर दिखाई देता है।
*आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की दिशा में बढ़ी संस्थागत प्रक्रिया*
वर्ष 2026 के सरकारी ई-प्रोक्योरमेंट रिकॉर्ड भी बताते हैं कि एसपी मेडिकल कॉलेज स्तर पर आधुनिक उपकरणों और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कई महत्वपूर्ण खरीद प्रक्रियाएं प्रारंभ की गईं। इनमें लगभग 70 लाख रुपये की मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर व्यवस्था, 85 लाख रुपये की आधुनिक डायग्नोस्टिक प्रणाली, डिजिटल C-Arm, न्यूरोसर्जरी ऑपरेशन टेबल और अन्य चिकित्सा उपकरणों की निविदा प्रक्रियाएं शामिल रहीं।
इनका उल्लेख उपलब्धि के बजाय स्वास्थ्य ढांचे को आधुनिक बनाने की दिशा में चल रही प्रक्रिया के रूप में किया जाना अधिक तथ्यात्मक होगा। इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि संस्थान में हाई-एंड डायग्नोस्टिक्स, ऑपरेशन थिएटर और गंभीर रोगी देखभाल से जुड़े संसाधनों को मजबूत करने की दिशा में प्रशासनिक गतिविधियां चली हैं।
*जिला अस्पताल में 24 घंटे डिजिटल एक्स-रे और ट्रॉमा केयर की दिशा में प्रयास*
डॉ. वर्मा का प्रशासनिक दायरा मुख्य कॉलेज परिसर और पीबीएम तक सीमित नहीं रहा। संबद्ध जिला अस्पताल में भी सेवाओं के विस्तार के प्रयास सामने आए।
जिला अस्पताल में 24 घंटे डिजिटल एक्स-रे सुविधा शुरू करने की दिशा में उन्होंने आवश्यक निर्देश दिए। इससे विशेष रूप से इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को रात के समय जांच के लिए दूसरे अस्पतालों में भेजे जाने की समस्या कम करने का लक्ष्य रखा गया।
इसी तरह जिला अस्पताल में लेवल-3 ट्रॉमा केयर सुविधा विकसित करने का प्रस्ताव चिकित्सा शिक्षा निदेशालय को भेजा गया। डॉ. वर्मा ने बताया था कि प्रस्तावित ट्रॉमा सेंटर में आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाओं के साथ गंभीर मरीजों को वहीं संभालने की क्षमता विकसित करने की योजना है।
इन प्रयासों का बड़ा उद्देश्य पीबीएम पर अनावश्यक दबाव कम करते हुए शहर के दूसरे हिस्सों में भी गंभीर एवं आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करना है।
*फाइलों से बाहर निकलकर निरीक्षण और मॉनिटरिंग पर भी जोर*
बड़े अस्पताल में केवल बैठकों के जरिए व्यवस्था नहीं सुधरती। व्यवस्थाओं का वास्तविक आकलन मैदान पर जाकर करना जरूरी होता है।
प्राचार्य बनने के कुछ ही समय बाद ट्रॉमा सेंटर के औचक निरीक्षण के दौरान बंद पड़े कुछ सीसीटीवी कैमरों सहित व्यवस्थागत कमियों पर नाराजगी जताए जाने की रिपोर्ट सामने आई। यह प्रशासनिक संदेश महत्वपूर्ण था कि मरीजों की सुरक्षा और अस्पताल की मॉनिटरिंग से संबंधित व्यवस्थाओं को केवल कागजी औपचारिकता नहीं माना जाएगा।
*सबको साथ लेकर चलने की शैली*
डॉ. वर्मा के पहले वर्ष की प्रशासनिक शैली का एक महत्वपूर्ण पहलू अलग-अलग चिकित्सा संगठनों और विभागों को एक मंच पर लाने का प्रयास भी रहा।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की तैयारियों के दौरान उनकी अध्यक्षता में आयोजित बैठक में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, मेडिकल कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन, रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन, विभिन्न विभागों के वरिष्ठ चिकित्सक और विद्यार्थी प्रतिनिधि एक साथ शामिल हुए। कार्यक्रम की जिम्मेदारियां अलग-अलग स्तर पर बांटी गईं और व्यापक सहभागिता पर जोर दिया गया।
यह उदाहरण भले ही चिकित्सा व्यवस्था का बड़ा नीतिगत निर्णय न हो, लेकिन नेतृत्व शैली को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। बड़े संस्थान में प्राचार्य अकेले परिणाम नहीं दे सकता; उसकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अलग-अलग विभागों और हितधारकों को साझा लक्ष्य के साथ कितना जोड़ पाता है।
*पहले पीबीएम का अनुभव, अब पूरे मेडिकल कॉलेज की कमान*
डॉ. वर्मा के लिए अस्पताल प्रशासन नया क्षेत्र नहीं था। प्राचार्य बनने से पहले वे पीबीएम अस्पताल के अधीक्षक रह चुके थे। इसी दौरान अस्पताल में दवाओं के सुरक्षित भंडारण के लिए अलग सब-स्टोर विकसित करने के उद्देश्य से उन्होंने जिला प्रशासन से डीएमएफटी मद में दो से चार करोड़ रुपये तक के बजट की मांग की थी। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में इस पहल का उल्लेख भी हुआ था।
अस्पताल अधीक्षक के तौर पर मिला यह अनुभव प्राचार्य पद पर उनके लिए महत्वपूर्ण आधार बना। पीबीएम की रोजमर्रा की समस्याओं, मरीजों के दबाव, विभागीय जरूरतों और संसाधनों की वास्तविक स्थिति को पहले से समझने का लाभ उनके वर्तमान प्रशासनिक निर्णयों में देखा जा सकता है।
*संकट के समय जल्दबाजी नहीं, जांच को दी प्राथमिकता*
एक प्रशासक की कार्यशैली केवल उपलब्धियों से नहीं, कठिन परिस्थितियों से निपटने के तरीके से भी परखी जाती है।
जून 2026 में पीबीएम में कुछ महिलाओं में प्रसवोत्तर गंभीर जटिलताओं का मामला सामने आया। एक मरीज की मृत्यु के बाद डॉ. वर्मा ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ विभिन्न जांच समितियों और प्रयोगशाला रिपोर्टों का अध्ययन कर वास्तविक कारण निर्धारित किया जाएगा। यानी गंभीर और संवेदनशील मामले में तत्काल अनुमान आधारित निष्कर्ष देने के बजाय वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया को प्राथमिकता दी गई।
*उपलब्धियों के साथ चुनौतियां भी कम नहीं*
एसपी मेडिकल कॉलेज और पीबीएम जैसे विशाल चिकित्सा तंत्र को संचालित करना आसान नहीं है। यहां पुरानी इमारतें, मरीजों की भारी संख्या, सीमित स्थान, उपकरणों का रखरखाव, अस्पतालों के बीच समन्वय, स्वच्छता, सुरक्षा और मानव संसाधन जैसी कई स्थायी चुनौतियां मौजूद हैं।
इसीलिए डॉ. वर्मा के एक वर्ष का मूल्यांकन केवल कार्यक्रमों और उद्घाटनों से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि संस्थागत फैसलों का असर मरीजों की सुविधा, चिकित्सकों की कार्यक्षमता और मेडिकल विद्यार्थियों की शिक्षा पर कितना दिखाई देता है।
उनके पहले वर्ष में इस दिशा में एक आधार जरूर तैयार होता दिखाई देता है—राजएपिकॉन जैसे बड़े अकादमिक आयोजन का प्रबंधन, मूंधड़ा मेडिसिन विंग को चिकित्सा तंत्र से जोड़ने की प्रक्रिया, आधुनिक जांच उपकरणों का समावेश, जिला अस्पताल में सेवाओं के विस्तार के प्रयास और अलग-अलग चिकित्सा संगठनों के साथ समन्वय इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
*नेतृत्व की पहचान: निर्णय भी, संवाद भी*
डॉ. सुरेंद्र कुमार वर्मा के पहले वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर शायद यही है कि उनकी प्रशासनिक कार्यशैली में अधिकार और संवाद दोनों को स्थान मिला।
जहां आवश्यकता हुई वहां स्पष्ट निर्देश दिए गए, वहीं बड़े आयोजनों और संस्थागत कार्यक्रमों में टीम को जिम्मेदारी देकर साथ लेकर चलने का प्रयास भी दिखाई दिया। चिकित्सा शिक्षा और रोगी सेवा जैसे दो बड़े दायित्वों के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने एसपी मेडिकल कॉलेज की अकादमिक पहचान को सक्रिय रखने और संबद्ध अस्पतालों की स्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तार देने पर ध्यान केंद्रित किया।
एक वर्ष का यह पड़ाव मंजिल नहीं, बल्कि अगले चरण का आधार है। अब चुनौती यह होगी कि शुरू की गई प्रक्रियाएं और प्रस्ताव धरातल पर पूर्ण क्षमता के साथ उतरें तथा आधुनिक चिकित्सा संसाधनों का लाभ उस मरीज तक पहुंचे, जिसके लिए सरकारी चिकित्सा व्यवस्था ही सबसे बड़ी उम्मीद है।
डॉ. वर्मा ने पदभार ग्रहण करते समय संस्थान को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने का लक्ष्य रखा था। पहले वर्ष के बाद कहा जा सकता है कि उस दिशा में आधार तैयार हुआ है—अब दूसरे वर्ष में उसकी गति और परिणाम दोनों पर निगाह रहेगी।























