महंत क्षमाराम जी महाराज ने अयोध्याकांड की चौपाइयों का वाचन कर भाई के प्रति प्रेम, कर्तव्य और मर्यादा का दिया संदेश
बीकानेर। हरि शरणम् ग्रुप की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामचरितमानस नवाह्न पारायण पाठ के छठे दिन शिव-पार्वती मंदिर के समीप स्थित माली समाज भवन में सींथल पीठाधीश्वर पूज्य महंत श्री 1008 क्षमाराम जी महाराज ने अयोध्याकांड में वर्णित प्रभु श्रीराम एवं भरत जी के संवाद का भावपूर्ण वाचन किया। महाराजश्री ने श्रीराम और भरत जी के बीच हुए संवाद की व्याख्या करते हुए भ्रातृप्रेम, त्याग, समर्पण और धर्म की मर्यादा का महत्व बताया। उनके द्वारा किए गए प्रसंगों के भावपूर्ण वर्णन से उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो गए।
महाराजश्री ने बताया कि भरत जी के हृदय में प्रभु श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम था। वे किसी भी परिस्थिति में अयोध्या का राजसिंहासन स्वीकार नहीं करना चाहते थे। उनका एकमात्र उद्देश्य प्रभु श्रीराम को वनवास से वापस अयोध्या लाना था। चित्रकूट में जब भरत जी ने श्रीराम से अयोध्या लौटने की विनती की, तब दोनों भाइयों के बीच धर्म, कर्तव्य और मर्यादा को लेकर भावपूर्ण संवाद हुआ।
महाराजश्री ने रामचरितमानस के दोहा—
**“राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥ २९६॥”**
का भावार्थ समझाते हुए बताया कि प्रभु श्रीराम की शपथ सुनकर सभा में उपस्थित मुनिजन और राजा जनक भी संकोच में पड़ गए। सभी भरत जी की ओर देखने लगे। यह प्रसंग भरत जी के प्रेम, विनम्रता और श्रीराम के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
### श्रीराम-भरत संवाद सुनकर दोनों सभाओं में छाया भावुक वातावरण
महाराजश्री ने आगे रामचरितमानस की चौपाई—
**“सुनि सुनि राम भरत संबादू।
दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥”**
का वाचन करते हुए बताया कि श्रीराम और भरत जी के बीच हुए संवाद को सुनकर दोनों ओर उपस्थित जनसमूह के हृदय में एक साथ हर्ष और विषाद के भाव उत्पन्न हो रहे थे। भरत जी का अपने बड़े भाई के प्रति प्रेम और प्रभु श्रीराम का पिता की आज्ञा तथा धर्म के प्रति अटूट संकल्प सभी को भावुक कर रहा था।
महाराजश्री ने कहा कि भरत जी के लिए राज्य और राजसुख का कोई महत्व नहीं था। वे श्रीराम को ही अयोध्या का वास्तविक राजा मानते थे। दूसरी ओर प्रभु श्रीराम ने भी अपने छोटे भाई के प्रेम और भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें धर्म तथा कर्तव्य का महत्व समझाया। यह संवाद भारतीय पारिवारिक परंपरा में भाई-भाई के रिश्ते की पवित्रता और आदर्श स्वरूप को प्रकट करता है।
### भरत जी का त्याग बना भ्रातृप्रेम का अनुपम उदाहरण
महाराजश्री ने भरत जी के चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि उन्होंने प्रभु श्रीराम की चरण पादुकाओं को अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान कर स्वयं सेवक के रूप में राज्य का दायित्व निभाया। उन्होंने राजमहल के सुखों का त्याग कर नंदीग्राम में रहकर श्रीराम की वापसी की प्रतीक्षा की। भरत जी का यह चरित्र हमें सिखाता है कि सच्चे प्रेम में अधिकार और स्वार्थ नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और समर्पण का भाव होना चाहिए।
महाराजश्री ने कहा कि श्रीरामचरितमानस के ये प्रसंग केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जीवन के आदर्शों का मार्गदर्शन करते हैं। प्रभु श्रीराम से हमें मर्यादा और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा मिलती है, वहीं भरत जी से निस्वार्थ प्रेम, त्याग और समर्पण की शिक्षा मिलती है। प्रत्येक व्यक्ति को इन आदर्शों को अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में अपनाना चाहिए।
### 2 नवंबर तक चलेगा श्रीरामचरितमानस पाठ
हरि शरणम् ग्रुप की शांता शर्मा ने बताया कि नौ दिवसीय श्रीरामचरितमानस नवाह्न पारायण पाठ का आयोजन 25 अक्टूबर से 2 नवंबर तक प्रतिदिन सुबह 11:30 बजे से किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पाठ का सीधा प्रसारण गोरबंद चैनल के यूट्यूब चैनल पर भी किया जा रहा है, जिससे घर बैठे भी भक्त इस आध्यात्मिक आयोजन से जुड़ सकते हैं।
हरि शरणम् ग्रुप के व्यवस्थापक कैलाश शर्मा ने समस्त धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से अधिकाधिक संख्या में कार्यक्रम में पहुंचकर पूज्य महाराजश्री की अमृतमयी वाणी का श्रवण करने तथा श्रीरामचरितमानस के आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।












