




ब्राह्मण स्वर्णकार समाज गणगौर उत्सव का 300 साल से भी अधिक पुराना इतिहास है
हर साल होलिका दहन के बाद रिख्या से पिंडोली बनाकर समाज के अलग अलग घरों में पिंडोलियों को विराजमान करके पूजा की जाती है।
जिस घर में गवर मांडी जाती है वहाँ पर समाज की युवतियाँ व महिलाओं द्वारा सुबह शाम आरती व पूजा की जाती है
महिलाएं व कुँवारी कन्या रंगोली बनाकर अपने मन के भाव प्रकट करती है। ये क्रम होली से लेकर चैत्र महीने की तीज तक चलता है
चैत्र महीने की बीज को गणगौर उत्सव के लाभार्थी परिवार की तरफ से पूरे समाज को मेंहदी वितरण करके आमंत्रित किया जाता है।
तीज को गणगौर माता की मूर्ति को टिकला रोटी का भोग लगाने के लिए सभी महिलाएं जाती है
चौथ को गवर माता की सवारी को समाज की महिलाएं अपने सर पर उठाए पूरे समाज में घूमती है व घर घर से माता की खोल भराई की रशम होती है
शाम को ब्राह्मण स्वर्णकार समाज के पंचायत भवन में गणगौर माता व ईशर जी की मन मोहक मूर्तियों को साथ विराजमान करके महिलाओं द्वारा सामूहिक घूमर नृत्य किया जाता है
फिर धिंगा गवर व बारह मासा गवर का मैला भी घूमर नृत्य के साथ संपन होता है
इस साल राजेश कुमार जी s /o प्रेम जी (हैदराबाद वाले ) के गणगौर उत्सव के लाभार्थी हैं













