बीकानेर: आईआईटी जोधपुर के शोधार्थियों के एक दल ने शुक्रवार को बीकानेर के विश्वविख्यात मीनाकारी और जड़ाऊ हस्तशिल्प कला से जुड़े स्वर्णकार परिवारों का सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षण पश्चिमी राजस्थान में व्यावसायिक कौशल और स्वदेशी हैंडीक्राफ्ट, विशेष रूप से जिले की पहचान मीनाकारी और कुंदन जड़ाऊ उत्पादों की वर्तमान स्थिति और लुप्त होती कला के संरक्षण पर केंद्रित था।
इस सिलसिले में, शोधार्थी दल ने बीकानेर के पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री जेठानंद जी व्यास से मुलाकात की। उन्होंने विधायक के साथ जिले के मीनाकार और कुंदन जड़ाऊ हस्तशिल्पकारों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी किए जा रहे कार्यों और उनके संरक्षण के उपायों पर विस्तृत चर्चा की। श्री व्यास ने दल के सदस्यों को इस पारंपरिक कला के महत्व और इसके कारीगरों की चुनौतियों से अवगत कराया।
यह शोध दल भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के तहत “पश्चिमी राजस्थान पारंपरिक व्यावसायिक कौशल के अंतर-पीढ़ी हस्तांतरण पर सामाजिक व आर्थिक प्रभाव” विषय पर शोध कर रहा है। उनका यह प्रयास राजस्थान की समृद्ध हस्तशिल्प परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, जिससे यह कला भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाई जा सके।
सर्वेक्षण के दौरान, दल के सदस्य राकेश सोनी के कार्यालय भी पहुंचे, जो स्वयं एक हस्तशिल्प मीनाकार रह चुके हैं। वहां उन्होंने हस्तशिल्पकारों द्वारा निर्मित उत्कृष्ट मीनाकारी और कुंदन जड़ाऊ उत्पादों का अवलोकन किया। यह उल्लेखनीय है कि राकेश सोनी द्वारा निर्मित मीनाकारी शेरवानी बटन और कुंदन जड़ाऊ के सेट को ईशा, आकाश और अनंत अंबानी की शादियों में नीता अंबानी ने सराहा था। इस अवसर पर, राकेश सोनी ने इस लुप्त हो रही विश्वविख्यात कला और इसके कलाकारों के पलायन के कारणों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि वे पिछले एक साल से बीकानेर कुंदन मीना हस्तशिल्प विकास संघ के सचिव के रूप में इस कला के प्रति जागरूकता बढ़ाने और इसे भौगोलिक संकेतक (GI tag) दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
सहायक आचार्य डॉ. आकांशा चौधरी के सुपरविजन में शोधार्थियों का यह दल मंगलवार को बीकानेर पहुंचा था। दल में नेहा, ज्ञानचंद, स्वेअता, वामा, जिकमिक, रिद्धि, मुकेश और अरविंद शामिल हैं। अपने भ्रमण के दौरान, शोधार्थी दल ने स्वर्णकार मीनाकारों के घरों का दौरा किया और उनके हस्तशिल्प कार्यों तथा विभिन्न उत्पादों का बारीकी से अध्ययन किया। इस गहन अध्ययन का उद्देश्य इस पारंपरिक कला की चुनौतियों और संभावनाओं को समझना है, ताकि इसके संरक्षण और विकास के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकें।















