बीकानेर
। सुगन जी महाराज के उपासरे में चल रहे चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य मुक्तांजना श्री जी महाराज साहब ने पांच इंद्रियों के विषय पर चल रहे विवेचन को आगे बढ़ाते हुए श्रद्धालुओं को इंद्रिय संयम का गूढ़ महत्व समझाया।
महाराज साहब ने कहा कि मनुष्य निरंतर अपनी पांचों इंद्रियों के माध्यम से संसार के विषयों से जुड़ता है और जब वह इंद्रियों के आकर्षण एवं उनके वश में होकर कार्य करता है, तो अनजाने में कर्मों का बंधन करता चला जाता है। आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा—इन पांचों इंद्रियों के विषयों में आसक्ति मनुष्य को आत्मस्वरूप से दूर ले जाती है।
उन्होंने समझाया कि इंद्रियों पर नियंत्रण केवल बाहरी रूप से विषयों का त्याग कर देने का नाम नहीं है, बल्कि विषय सामने आने पर भी मन को उनके प्रति आसक्त न होने देना ही वास्तविक संयम है। यदि मनुष्य जागरूकता, विवेक और आत्मचिंतन के साथ अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखे तो वह अनेक प्रकार के कर्म बंधनों से स्वयं को बचा सकता है।
धर्मसभा में महाराज साहब के गहन एवं सारगर्भित विवेचन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया। प्रवचन के दौरान यह संदेश विशेष रूप से उभरकर सामने आया कि इंद्रियां यदि हमारे नियंत्रण में हैं तो वे साधना का माध्यम बन सकती हैं, लेकिन यदि हम इंद्रियों के नियंत्रण में आ जाएं तो यही कर्म बंधन का कारण बन जाती हैं।
‘अमिचंद की अमी दृष्टि’ में आया नया मोड़
चातुर्मास के धार्मिक आयोजन के साथ चल रहे ‘अमिचंद की अमी दृष्टि’ के कथानक ने भी श्रोताओं में विशेष उत्सुकता बनाए रखी। आज के प्रसंग में कहानी ने एक भावनात्मक मोड़ लिया।
कथानक के अनुसार, विनु ने अमीचंद के सामने अलग घर और अलग दुकान करने की इच्छा व्यक्त की। विनु की यह बात सुनकर अमीचंद को गहरा आघात लगा और वह अचानक बेहोश हो गया। कुछ समय बाद जब उसे होश आया तो उसके सामने एक नई चिंता खड़ी थी।
होश में आने के बाद अमीचंद ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा—“यह बात मैं तुम्हारी भाभी को कैसे बताऊंगा?”
अमीचंद की यह स्थिति कथानक में पारिवारिक रिश्तों, भावनात्मक जुड़ाव और परिस्थितियों के बीच उत्पन्न होने वाले तनाव को उजागर करती है। विनु के अलग होने के निर्णय ने कहानी में नया मोड़ ला दिया है और अब यह देखना रोचक होगा कि अमीचंद इस परिस्थिति का सामना किस प्रकार करता है।
धर्मसभा में जहां एक ओर इंद्रियों पर संयम और कर्म बंधन से बचने का आध्यात्मिक संदेश मिला, वहीं दूसरी ओर कथानक के माध्यम से मोह, ममता, पारिवारिक संबंधों और जीवन की परिस्थितियों का भावनात्मक चित्रण देखने को मिला। दोनों प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को धर्म के साथ-साथ जीवन की वास्तविक परिस्थितियों पर भी चिंतन करने का अवसर दिया।
मनीष नाहटा
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