

सन्त सती और सूरमाओं की पावन धरा है राजस्थान
शस्त्र और शास्त्र की टकसाल है राजस्थान की राजधानी जयपुर
जयपुर। भारत के महानतम धर्मगुरु, पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निरंजन देव तीर्थ जी महाराज की 30वीं पुण्यतिथि पर देश में “शंकराचार्य स्मृति वन्दन सप्ताह” बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस साप्ताहिक आयोजन में आज उनके कर्म-क्षेत्र, महाराज संस्कृत महाविद्यालय के दिव्य परिसर में पूजा अर्चना कर उनके चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया गया। अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ के राष्ट्रीय संयोजक आचार्य डॉ. सप्तर्षि मिश्र ने इस अवसर पर कहा कि सन्त, सती और सूरमाओं की पावन धरा राजस्थान में जन्मे, महाराज संस्कृत महाविद्यालय, जयपुर के प्राचार्य पद को सुशोभित करने वाले, गो-विप्रवंश रक्षक, निजकुल मर्यादा परिपालक, सनातन धर्म रक्षक धर्म सम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज द्वारा 1966 में गोरक्षा आंदोलन के समय 72 दिनों तक आमरण अनशन करने वाले, मनस्वी, तपस्वी, यशस्वी और ओजस्वी व्यक्तित्व के धनी पुरी पीठाधीश्वर आचार्य से प्राचार्य और अपने ओजस्विता से जगद्गुरु शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित अनंतश्री विभूषित स्वामी श्री निरंजन देव तीर्थ जी महाराज हम जैसे अनेक शिष्यों के प्रेरणास्रोत हैं।
डॉक्टर सप्तर्षि मिश्र ने राजस्थान सरकार से मांग करते हुए कहा कि स्वामी श्री निरंजन देव तीर्थ जी महाराज की जीवनी विद्यालय, महाविद्यालय स्तर पर पढ़ाया जाना चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सके।आराधना दिवस के मौके पर महाविद्यालय की प्राचार्य प्रोफेसर डॉ शालिनी सक्सेना ने कहा- पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य, स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाराज सनातन धर्म के रक्षक, अद्भुत शास्त्र ज्ञान, प्रखर वक्तृत्व कौशल, और सनातन सिद्धांतों के प्रति दृढ़ संकल्प के लिए जाने जाते रहे हैं। पूज्य गुरुदेव का संन्यास ग्रहण से पूर्व का नाम पंडित चन्द्रशेखर द्विवेदी था। पूज्यपाद शंकराचार्य के नाते इस संस्थान का नाम आज देश दुनिया में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। हमारा सौभाग्य है कि हम इस विद्या के मंदिर में सेवा कार्य कर रहे हैं।
प्रोफेसर ताराशंकर शर्मा ने जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज के जीवन से जुड़े घटनाक्रम को श्लोकों के माध्यम से सुनाकर पुष्पांजलि सभा का गौरव बढ़ाया। पूर्व निदेशक प्रोफेसर मण्डन शर्मा ने कहा कि स्वामी जी महाराज कहा करते थे कि अपने दुख और सुख किसी को भी ना सुनाओ,दुख सुनाओगे तो लोग हंसेंगे और सुख सुनाओगे तो लोग ईर्ष्या करेंगे। इसलिए अगर दुख और सुख सुनाना है तो गुरु या गोविन्द को सुनाओ। मुख्य अतिथि आई ए एस अफसर रहे श्याम सुन्दर बिंसा ने कहा कि संस्कृत महाविद्यालय परिसर में आयोजित महान् विभूतियों में एक जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज के पुष्पांजलि सभा में उपस्थित भाई बन्धु संकल्प लें कि संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों का जन जागरण कर आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान बनाएं।रामानन्दाचार्य पीठ के श्रीमहंत आचार्य डॉ सियाराम दास ने कहा कि तकदीर और किस्मत में जो लिखा है उसे कोई रोक नहीं सकता और जो नहीं लिखा उसे कोई दे नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को सदैव ईश्वर से जुड़े रहकर अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।
उपनिदेशक डॉ शिव चरण शर्मा ने जगद्गुरु शंकराचार्य के जीवन परिचय को स्वरचित निरंजनसप्तक संस्कृत श्लोक माला सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और वह अभिनन्दन पत्र अखिल भारत वर्षीय धर्म संघ के राष्ट्रीय संयोजक डॉ सप्तर्षि मिश्र को प्रदान किया।
पुष्पांजलि सभा की अध्यक्षता कर रहे पूर्व निदेशक संस्कृत शिक्षा, राजस्थान प्रोफेसर भास्कर शर्मा ने कहा कि राजस्थान प्रांत में ही नहीं राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निरंजन देव तीर्थ जी महाराज का नाम अंकित है,गो सेवा में उन्होंने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि रिटायर आई ए एस श्याम सुंदर बिंसा प्रोफेसर मण्डन शर्मा, डॉ शिव चरण शर्मा, प्रोफेसर ताराशंकर शर्मा आदि ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया, वेद विभाग के आचार्य डॉ रणजीत कुमार झा द्वारा वैदिक और पौराणिक मंगलाचरण डॉ अमन शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया। महाविद्यालय परिसर में स्थापित श्रीगणेश प्रितिमा का विधिवत पूजन कर मोदकार्चन ,दूर्वार्चन सहस्त्रार्चन कराया गया।पुष्पांजलि सभा का मंच संचालन एवं समन्वयन डॉ सीमा जैन ने किया।
पुष्पांजलि सभा में पूज्य शंकराचार्य जी के पूर्वाश्रम के परिजनों सहित मारुति नंदन शास्त्री, शिव भगवान शास्त्री, वैद्य दिनेश शर्मा , गजेन्द्र दीक्षित आदि ने अपने विचार रखे। उपस्थित संस्कृत महाविद्यालय के विद्यार्थियों एवं जनसमूह ने महाराज जी के जयकारे लगाकर परिसर को गुंजायमान कर दिया।
हमारे ऑल इंडिया ब्यूरो चीफ इन्द्रचंद मोदी ने उक्त जानकारी दी ।
















