/श्रीडूंगरगढ़ की स्थापना जेठ के महीने की तीज तिथि को विक्रम संवत 1939 को आज से लग-भग 142 साल पूर्व बीकानेर के महाराज श्री डूंगरसिंह जी के द्वारा नगर श्रीडूंगरगढ़ को बसाकर की गई। बताया जाता है कि श्री डूंगरगढ़ की धरती पर कभी सरस्वती नदी बहा करती थी जो समय के साथ-साथ कई कारणो से नदी यहां विलुप्त हो गई और इस जगह पर बड़े-बड़े रेत टील्लै (धोरे) उभर कर सामने आ गाए। सरस्वती नदी के होने से यहां के कुओं का पानी बड़ा ही मीठा और शीतल था इस कारण महाराज श्री डूंगरसिंह जी ने यहां नगर बसाने की सोची ताकि सबसे पहले लोगों को शुद्ध मीठा पानी मिल सके ।श्रीडूंगरगढ़ आज नहीं हमेशा से धार्मिक रहा यहां ठाकुर जी, हनुमान जी, रामदेव जी एवं और भी कई लोक देवी देवताओं के मंदिर विभिन्न मोहल्ले में स्थापित है और कुछ प्रसिद्ध मंदिर श्री डूंगरगढ़ के आस-पास की दूरी में स्थापित है जिसमें प्रसिद्ध सालासर धाम, पूनरासर धाम, लक्खासर धाम, सेरूणा आदि आदि प्रमुख है। श्रीडूंगरगढ़ में जैन श्वेतांबर धर्म के संत महात्माओं का भी यह मुख्य स्थान रहा यहां आज भी बड़े-बड़े संत महात्मा पाठ, पूजा, चौमासा एवं वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं, ठहरते हैं, तप ध्यान भी करते हैं। श्री डूंगरगढ़ की बनावट एक प्याले-नुमां आकृति जैसी है। हाईवे मार्ग पर से अगर श्रीडूंगरगढ़ को देखा जाए तो पूरा श्रीडूंगरगढ़ आपको प्याले की आकृति में दिखता नजर आएगा। श्री डूंगरगढ़ में मोहल्ले नहीं यहां सिर्फ प्राचीन पद्धति के अनुसार बास का प्रचलन रहा इसलिए यहां बास बसे हुए हैं जिनका अलग-अलग नाम भी है। एक समय में श्रीडूंगरगढ़ में घोड़ा-तांगा बहुत ज्यादा हुआ करता था और आवागमन के लिए मुख्य साधन घोड़ा तांगा ही रहा क्योंकि यहां हर क्षेत्र में कच्चे मार्ग ही थे। समय के साथ-साथ यहां हर गली मोहल्ले में सड़के बन गई और घोड़ा तांगा की जगह अब टैक्सी टेंपो आदि का ले ली इन्हीं साधनों से आवागमन अब हो रहा है। यहां की लाख से बनी चूड़ियां बड़ी प्रसिद्ध रही,चूड़ियां बनाने वालों को यहां लक्खारे नाम से संबोधित किया जाता था। यहां की लाख की चूड़ियां पूरे भारतवर्ष में पहचानी जाती थी। श्रीडूंगरगढ़ में ब्राह्मण,बांणीया के अलावा बहुत सी जाति के लोग यहां श्रीडूंगरगढ़ बसने के समय से निरंतर रह रहे हैं। बताया जाता है कि जब श्री डूंगरगढ़ बसा उस वक्त सवा रुपए में बीकानेर महाराज की ओर से श्रीडूंगरगढ़ वासीयों को पट्टा भी जारी कर दिया गया था। श्री डूंगरगढ़ की हवेलियां शेखावाटी की तर्ज पर सेठ साहूकारों के द्वारा बहुत ही सुंदर बनाई गई। यहां प्राचीन हवेलियों में चुने का इस्तेमाल किया गया है उस वक्त सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ करता था। यहां आधुनिकता पहले भी थी और अब भी है यहां एक गली से दूसरी गली को सीधे हम देख सकते हैं इस प्रकार से श्रीडूंगरगढ़ की बनावट है। यहां का कालू बास बड़ा ही प्रचलित है, कालू बास को पहले और किसी नाम से जाना जाता था अब कालू नाम प्रचलित है। यहां हर जाति धर्म के लोगों की धर्मशालाएं,भवन इत्यादि बने हुए हैं जो लोगों के आवश्यकता पड़ने पर काम आते हैं। श्री डूंगरगढ़ का बैंड भी प्रसिद्धी पाए हुए हैं यहां का बैंड भारत के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न कार्यक्रमों में पहुंचकर अपनी सवर लहरिया बिखारकर प्रसिद्धी पाए हुए हैं। श्रीडूंगरगढ़ के लोगों ने बाबा रामदेव जी में खूब प्रीति लगाई और यहां से काफी लंबे समय से सैकड़ो हजारों व्यक्तियों के जत्थो के द्वारा बाबा रामदेवरा पैदल चलकर धोख लगाई जाती है,यंहा का बाबा रामदेवरा पैदल संघ भी काफी प्रचलित है। श्रीडूंगरगढ़ के निवासियों की भाषा “भाई जी” “काकोजी” “दादो जी” इत्यादि कहकर एक दूसरे को संबोधित एवं पुकारा जाता है। यहां घर-घर को गोप्रेमी मिलेंगे गौ माता से प्रेम और नंदी भगवान की पूजा यहां इस क्षेत्र में की जाती है। यहां आस-पास गौशालाएं भी है जिसमें निराश्रित गो वंश को रखा जाता है और इन गौशालाओं में समय-समय पर बड़े ही धूमधाम से उत्सव भी मनाए जाते हैं।यहां जमीन के किसी बाड़े को “नोहरा” कहा जाता है और खिड़की को “मोरी” शब्द कहकर बुलाया जाता है। दुख दर्द एवं खुशी के आयोजनों में लोग जाति धर्म को नहीं देखते सभी एकत्रित होकर कार्य करते आए हैं यह यहां की बड़ी विशेषता है। समय के साथ-साथ श्रीडूंगरगढ़ का अंदर का बाजार बड़ा ही शंकरा हो गया,एक समय था जब यह बाजार चोड़ा हुआ करता था उस वक्त बसें भी कम आया जाया करती थी और यात्रियों को बस स्टैंड से घर ले जाने का साधन सिर्फ तांगा घोड़ा था। यहां रेलवे स्टेशन भी है लेकिन शहर से काफी दूरी पर स्थित है यहां पर भी आवागमन का साधन पहले तांगा घोड़ा ही हुआ करता था और अब टैक्सी टेंपो आदि। यहां के लोग आज भी प्रातः कालीन उठकर अपनी नित्य क्रिया संपन्न करते हैं। यहां की महिलाएं अपनी लोक संस्कृति के अनुसार पारंपरिक गीत गाने में माहिर है आज भी यहां पुराने गीत सुनने को महिलाओं मुखारविंद से सुनने को मिल जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी श्रीडूंगरगढ़ पहले भी अग्रणी था और अब भी है। यहां बड़ी-बड़ी स्कूले एवं कॉलेज स्थापित की हुई है। यहां कुछ हॉस्टल भी है जिसमें बच्चों को शिक्षा खेल संस्कृति के बारे में निशुल्क सिखाया जाता है। श्री डूंगरगढ़ में पहले मुख्य फसलें मौठ, बाजारा, मूंग,तिल गवार इत्यादि बरानी खेतों में ही हुआ करते थे अब समय के साथ-साथ यहां हर प्रकार की फसलें होती है और सिंचाई का साधन भी यहां ट्यूबवेल है। आपको बता दें कि यहां एक समय था जब जमीन बहुत कम रुपए में मिल जाया करती थी लेकिन आज सबसे ज्यादा कीमत जमीनों की श्री डूंगरगढ़ में है। श्री डूंगरगढ़ में पुराने जमाने में दूध का पेड़ा बड़ा ही प्रसिद्ध पकवान था, आज हर प्रकार के पकवान यहां मिल जाते हैं और प्याज कचोरी यहां की बड़ी प्रसिद्ध बताई जाती है। आप सभी को में यह बात बताना उचित समझते हैं कि यहां हर गली मोहल्ले में आपको बड़े-बड़े पीपल के वृक्ष मिलेंगे। यहां किसी के भी घर का मुख्य गेट छोटा नहीं होकर बड़ी पिरोल (बड़ा दरवाजा) ही लगाया जाता है। यहां राष्ट्रीय पक्षी मोर बहुतायात मैं पाए जाते हैं। वर्षों पहले यहां के झोंपे बहुत प्रसिद्ध हुआ करते थे और यहां की कंटीली बोलटी के सुखे कांटों की चार दिवारी के लिए बाड़े भी बहुत प्रसिद्धि हुआ करती थी और देखने में भी बड़ी सुंदर लगती थी। आज भी आपको यहां झोंपे एवं बाड़े देखने को जरूर मिलेगी। यहां के सेठ साहूकार ज्यादातर बाहर के बड़े शहरों में अपने काम धंधों के सिलसिलो में प्रवासी हैं। यहां के सेठ साहूकार बड़े अच्छे दानदाता हैं और समय-समय पर यहां उनके द्वारा बड़ा आर्थिक सहयोग देकर हॉस्पिटल मंदिर आदि को तैयार करवाते है।यहां हर गली मोहल्ले में आपको ठंडे पानी की प्याऊ जल मंदिर मिल ही जाएंगे। रोग निदान के लिए अंग्रेजी ट्रीटमेंट के अलावा यहां आयुर्वेदिक होम्योपैथिक आदि की भी अस्पताले साहूकारों के द्वारा बनाई गई है जहां लोग हजारों की तादाद में दवाई लेकर तैयार होते हैं। समय-समय पर यहां बड़े कैंप लगाकर लोगों के आंखों के ऑपरेशन आदि नि:शुल्क किए जाते हैं। यहां की एक विशेषता यह है भी हे कि आप श्रीडूंगरगढ़ के अंदर किसी भी व्यक्ति का अगर एड्रेस पूछते हैं तो यहां के लोग तुरंत आपको एड्रेस बता देंगे यहां के लोगों की एक दूसरे में इतनी बड़ी जान पहचान होती है।
श्री डूंगरगढ़ का स्थापना दिवस हर वर्ष जेठ बदि तीज को मनाया जाता है इसी दिन श्रीडूंगरगढ़ की स्थापना हुई। जेठ बदि दूज को पूर्व दिवस संध्या कार्यक्रम 25 मई 2024 को विभिन्न सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन के साथ मनाया जाता है।
श्रीडूंगरगढ़ में तालवाला हाई स्कूल कब बना होगा
यह हाई स्कूल अक्टूबर 1938 में बीकानेर राज्य की ओर से बना। इसका प्रारंभिक नाम एंग्लो वर्नाक्युलर मिडिल स्कूल रखा गया। शुरूआत में यह मीडिल स्कूल थी किन्तु शीघ्र ही यह क्रमोन्नत होकर सैकण्ड्री तक हो गया। नौ वर्ष बाद इसका नाम राजकीय सैकण्ड्री स्कूल हो गया। स्कूल के निर्माण में बीकानेर राजाजी के 31000/=रुपये खर्च हुए।










श्रीडूंगरगढ़ का पुराना नाम था रूपालसर
रूपालसर (श्रीडूंगरगढ का प्राचीन नाम) था के जागीरदार किशनसिंघोत बीकों ने संवत 1727 में आसकरण सिंह बीका के पुत्र फतहसिंह पांचू गांव छोड़ कर यहां रूपालसर आ बसे, उन्हें यह गांव पट्टे में प्राप्त हुआ।
सबसे पहले यहां एक कच्चे तलाब का निर्माण हुआ जाने
यहां गांव के निकट स्थित ताल में एक कच्चे जोहड़ तालाब का निर्माण करवाया जिसका नाम फतहसागर तालाब नाम रखा गया ।कालान्तर में इसी तालाब को नागर मल बाजोरिया रतनगढ निवासी ने पक्का बना दिया ।ठाकुर फतहसिंह ने अपने पिता आसकरण सिंह की याद में तालाब के किनारे एक छतरी भी बनवाई जो आज भी मौजूद है।बताया जाता है कि बाजार के मध्य स्थित मढी के कुए का जीर्णोद्धार भी उन्होंने ही करवाया। छतरी के खम्भे पर अवस्थित शिलालेख में संवत 1772 अंकित है ।बीकों की वंशावली में भी उनके द्वारा करवाए गए निम्न निर्माणों का उल्लेख है ।संवत 1939 में जब नया श्रीडूंगरगढ बसना प्रारंभ हुआ तो बीकानेर राज द्वारा यहां के बीकों से रूपालसर खालसे कर इस परिवार को सूरजड़ा गांव पट्टे में दे दिया गया ।सूरजड़ा कोलायत तहसील का गांव है ।उस समय मोहबतसिंह के चार पुत्र 1 – रणजीत सिंह-2-उमेदसिंह, 3- मोतीसिंह, 4- रिड़माल सिंह पट्टेदार थे एक पुत्र जेठमालसिंह यहीं रह गए ।वर्तमान में यहां सभी बीका उन्हीं के वंशज हैं ।
[श्रीडूंगरगढ की स्थापना से पूर्व लगभग नौ सौ वर्ष प्राचीन सारसू गांव तथा लगभग आठ सौ वर्ष पुराने रूपालसर नामक दो गांवों को समाहित करते हुए, बीकानेर के महाराजा डूंगरसिंहजी ने अपने नाम पर इस शहर को संवत 1939 ज्येष्ठ कृष्णा तृतीया को बसाया। बीकानेर का प्रशासनिक कार्य देखने वाले रामपुरिया को शहर की बसावट का कार्य सौंपा गया।
श्री डूंगरगढ़ के प्रसिद्ध बास जिन गांव से लोग आए उन्हें के नाम पर बास बस गए
शहर को चार समानांतर गलियों में विभक्त कर, चार बास (मौहल्ले) कायम किए गए ।प्रलोभन देकर निकट पड़ोस के गांवों से लोगों को बसने के लिए बुलाया गया। कालू से अनेक जातियों को साथ लेकर भादानी आए, वे जहां बसे वह कालू बास हो गया। बिग्गा से डागा आए, वे जिस मुहाने पर बसे, उस क्षेत्र का नाम बिग्गा बास पड़ा। मोमासर से सेठिया आए, वे जहां बसे उस मौहल्ले का नाम मोमासर बास पड़ा और इसी प्रकार आडसर से मूंधड़ा और कई जातियां आकर बसी, उनका मौहल्ला आडसर बास कहलाया।
उस वक्त भी निवास स्थान के पट्टे वितरित किए गए
प्रत्येक घर के पट्टे के लिए एक नाप 1218 गज रखा गया। तीन पट्टे आगे, तीन पीछे और उसके बाद चौराहा।
श्री डूंगरगढ़ में क्यों है पीपल वृक्ष ज्यादा,बड़ी अच्छी सोच थी पीपल लगाने की

श्री डूंगरगढ़ के हर चौक चौराहे में पीपल का एक पेड़ लगाने की प्रेरणा दी गई। जिसे हर किसी ने अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जितने चौराहे उतने पेड़। यह शहर सर्वाधिक पीपल के वृक्ष वाला शहर है। पीपल सींचन और पीपल पूजन, संरक्षण का बड़ा भारी धार्मिक महत्व है। पीपल में साक्षात् भगवान विष्णु का वास होता है। श्री डूंगरगढ में जल की बहुत कमी थी।कुए से सिर पर एक -एक घड़ा पानी ढोकर, सबसे ज्यादा आक्सीजन देनेवाले इस वृक्ष को पल्लवित करनेवाले हमारे श्री डूंगरगढ़ के उन पूर्वजों को प्रणाम है।
श्रीडूंगरगढ़ निवासी वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी श्रीतोलाराम मारू के सुझाव- भविष्य के लिए श्री डूंगरगढ़ नगर का हो सकता है बड़ा सुगम और सरल कार्य.
जाटिया कुआ तथा पुराने बस स्टैंड को मिलाकर 10 पट्टा जमीन है। यहां नीचे प्राइवेट बसों का स्टैंड तथा टैक्सी स्टैंड हो सकता है। प्रथम तल पर विशाल सब्जी मंडी हो सकती है। ऊपर छत होने पर आंधी तूफान बरसात में भी आराम से सब्जी खरीदी जा सकती है। हर पल आपका थैला छीननेवाले सांडों से निजात मिल जाती है। प्रथम तल के रास्ते पर रैम्प बना होने से चढने में भी अत्यंत सुगमता रहेगी। दूसरे और तीसरे तल पर खूब दुकानें हो सकती हैं। अंडरग्राउण्ड में कार पार्किंग बनाई जा सकती है। पर सवाल यह है कि ऐसा कोई नगरपालिका क्यूं करेगी या कोई विधायक क्यूं करेगा। इससे तो खाली नाम हो सकता है। खाली नाम के लिए कौन माथापच्ची करे।
श्री डूंगरगढ़ स्थापना दिवस पर आज उस व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए जो लगातार 17 वर्षों से श्री डूंगरगढ़ को डूंगरगढ़ ना कहकर श्री डूंगरगढ़ ही बोला जाए पर खूब मेहनत की वह है आप सभी के जाने एवं पहचाने श्री डूंगरगढ़ निवासी सामाजिक कार्यकर्ता वरिष्ठ पत्रकार श्रीमान तोलाराम जी मारू।

आलेख- पहलवान महावीर कुमार सहदेव














