




साधुमार्गी जैन महिला समिति का दो दिवसीय राष्ट्रीय शिविर ’’स्वर्णकुंभ’’ संपन्न
श्राविकाएं आत्म कल्याण का लक्ष्य रखे-उपाध्याय प्रवर राजेश मुनि
बीकानेर, 20 सितम्बर। अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन महिला समिति का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ’’स्वर्णकुंभ’’ रविवार को साधुमार्गी जैन संघ के राष्ट्रीय संत, आचार्य प्रवर रामलालजी, उपाध्याय प्रवर राजेश मुनि व चारित्र आत्माओं के सानिध्य में गंगाशहर मार्ग के आदिनाथ भवन में पारितोषिक वितरण व ’’ पढमं नाणं तओ दया’’ संकल्प’’ के साथ संपन्न हुआ।
विशेष जिज्ञासा समाधान सत्र- में उपाध्याय प्रवर राजेश मुनि ने कहा कि धार्मिक-आध्यात्मिक क्रियाओं का लक्ष्य आत्म शुद्धि, आत्म चेतना व आत्म प्रगति तथा आत्म कल्याण का रखे । भौतिक सुखों की प्राप्ति की कामना नहीं करें। भौतिक सुख प्रारब्ध, पूर्व कर्मों व पुरुषार्थ के अनुसार व्यक्ति को अपने आप मिलते है। जिन्दगी के पथ पर कषायों को त्याग कर सकारात्मक सोच के साथ अच्छे चालक बनें। स्वयं अपने जीवन को सही रास्ते पर ले जाए तथा अपने परिवार, संघ व समाज को उज्जवल पथ दिखाएं । अपने तथा अपने परिवार के स्तर को ऊंचा उठाएं तथा हीन भावना व नकारात्मक सोच तथा काम,का्रेध, लोभ व मोह आदि कषायों का त्याग करें। कभी भी हिम्मत नहीं हारे, उत्साह के साथ जो अच्छा कार्य करने में समर्थ है, उसे करें। किसी के प्रति घृणा या अत्यधिक प्रेम कर्म बंधन का कारण तथा धर्म-अध्यात्म के मार्ग में अवरोद्ध पैदा करता है, समता भावना के साथ घृणा व अंधे प्रेम से बचें । एकत्व भावना से ध्यान, साधना व चिंतन से अपनी समझ को विकसित करें तथा जाने-अन्जाने में हुई अपनी गलती को स्वीकार करें। दूसरों की बजाए दुर्गुणों को देखे तथा उसको दूर करने का प्रयास करते हुए सदगुणों का विकास करें। परिवार नियोजन के चक्कर में अप्राकृतिक प्रक्रियाओं को नहीं अपनाएं। अनचाहे जीव के आने पर उसके प्रति आत्मीय प्रेम व सम्मान देते हुए उसके साथ अच्छा व्यवहार करें। अपने आपको को श्रेष्ठ समझते हुए परिवार, संघ व समाज की सेवा करें।
सेवा सदन में शिविर में आई देश के विभिन्न स्थानों की साधुमार्गी संघ की सदस्याओं व पदाधिकारियों ने साध्वी राममित्रा श्रीजी के सान्निध्य मंें रामामृतम ध्यान साधना की। साध्वी श्री रामप्रीति म.सा. ने कम बोलने, धीरे बोलने व मीठा बोलने व सार्थक बोलने का संदेश दिया। वहीं नीरज मुनि ने ’’आगम ऑल इन वन’’ के माध्यम से जैन आगमों का अध्ययन करने की सीख दी।
समापन समारोह-गंगाशहर मार्ग के आदिनाथ भवन में हुए अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन महिला समिति के समापन समारोह में अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेन्द्र गांधी ने कहा कि एक श्राविका के शिक्षित, संस्कारिक व धार्मिक होने से पूरा परिवार व समाज सशक्त होता है। समिति के राष्ट्रीय मंत्री सुरेश बच्छावत, श्री साधुमार्गी सेवा समिति के अध्यक्ष कन्हैया लाल बैद, अहिंसा प्रचारक महेश नाहटा मौजूद थे।
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन महिला समिति का राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती चंचल सांखला ने कहा कि शिविर से प्रेरणा लेकर अपने आत्म स्वरूप् को स्वर्ण जैसे निखारने के लिए प्रयास व पुरुषार्थ करें। अपने कार्य, व्यवहार, साधना आराधना, देव, गुरु व धर्म के प्रति समर्पण के साथ सोने की तरह अपने व्यक्तित्व में निखार लाएं।
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन महिला समिति का राष्ट्रीय महामंत्री प्रीति डागा ने संगठन की राष्ट्रीय, अंचल व जिला स्तर पर संचालित केसररिया कार्यशाला, संगठन में शक्ति,साधार्मिक सेवा,विद्यार्थी छात्रवृति व प्रोत्साहन योजना, धार्मिक परीक्षाओं व अन्य गतिविधियों से अवगत करवाया। उन्होंने कहा कि बीकानेर में हुआ यह शिविर अपने आप में सार्थक व प्रेरणा दायक रहा है। इसमें देश के सभी प्रांतों से साधुमार्गी महिला समिति की सदस्याओं ने हिस्सा लेकर देव, गुरु व संगठन के प्रति समर्पण का संदेश दिया है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों का आभार क्त किया।
संघ की पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री दिल्ली की स्नेहलता कोठारी ने शिविर में शामिल सभी करीब 400 सदस्याओं को ’’पढमं नाणं तओ दया’’ नामक संकल्प पत्र प्रदान किया तथा उसको नियमित आत्म चिंतन के साथ पढ़ने व भरने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि यह संकल्प पत्र एक ठहराव का, स्वयं को देखने का, और भीतर उतरने का संदेश देता है। अपने भावों व विचारों को समझने की एक अंतर्यात्रा है। यह सजग प्रयास है, आत्म चिंतन की ओर बढ़ते कदमों का और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में एक सार्थक पहल का।
संघ की राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष नीतू मुहणोत ने शिविर के मुख्य उद्धेश्य को अवगत करवाते हुए कहा कि यह शिविर जैन दर्शन के महान ग्रंथ दशवैकालिक सूत्र के अमर सिद्धान्तों पर आधारित है। यह सूत्र हमें जीवन जीने की सही कला को सीखता है। दशवैकालिक सूत्र की वाणी का संदेश है कि दया व करुणा के मार्ग पर चलने से पहले सम्यक ज्ञान की रोशनी होनी अनिवार्य है, बिना ज्ञान के की गई दया कई बार विवेक हीन हो जाती है।














