कोटा। रांगड़ी चौक स्थित सुगनजी महाराज के उपाश्रय में आज आयोजित धर्मसभा में पूज्य चित्तखरांजना जी महाराज साहब ने 14 भावनाओं के अंतर्गत करुणा भावना का विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने भगवान महावीर और चंड कौशिक सर्प के प्रसिद्ध दृष्टांत का उल्लेख करते हुए बताया कि जब चंड कौशिक ने भगवान महावीर को डसा, तब भी उनके शरीर से रक्त के स्थान पर दूध की धारा प्रवाहित हुई। भगवान ने उस सर्प के प्रति भी करुणा का भाव रखते हुए उसे “बुझ्झि बुझ्झि चंड कौशिक” कहकर संबोधित किया। भगवान की करुणा से चंड कौशिक को अपने पूर्व जन्मों के सत्कर्मों का स्मरण हुआ और उसने अनशन ग्रहण कर अपने जीवन का कल्याण किया।
महाराज साहब ने कहा कि जीवन में स्वीकार भाव अत्यंत आवश्यक है। स्वीकार करने में सुख है तथा स्वीकार करने से दुःखों की परंपरा समाप्त हो जाती है। यदि व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति को सहज भाव से स्वीकार कर ले, तो उसके अधिकांश दुःख समाप्त हो सकते हैं। सभी व्यक्ति सुख चाहते हैं और दुःख नहीं चाहते, किंतु कर्मों के कारण दुःख का अनुभव करना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि भगवान महावीर ने समस्त जीवों पर अपार करुणा की और अपने अंतिम समय में भी 16 प्रहर तक निरंतर देशना देकर जनकल्याण का कार्य किया। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि हिंसा केवल शारीरिक रूप से ही नहीं होती, बल्कि वाणी, बर्ताव और व्यवहार से भी हिंसा हो सकती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार में सजग रहकर अहिंसा और करुणा का पालन करना चाहिए।
इस अवसर पर उन्होंने एक प्रेरक संदेश देते हुए कहा—
“To think for yourself, use your head;
To think for others, use your heart.”
धर्मसभा में परम पूज्य मुक्तांजना श्रीजी महाराज साहब ने अमितचंद की अमित दृष्टि के कथानक को आगे बढ़ाते हुए संयुक्त परिवार की पृष्ठभूमि में छोटे भाई विनय कुमार के अपने बड़े भाई एवं भाभी के प्रति विनय, सम्मान और पारिवारिक समर्पण के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया।
प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएँ उपस्थित थीं और सभी ने करुणा, अहिंसा तथा स्वीकार भाव के संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया।

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